What Are Emotions Called? (Part - 16) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 16)
- ayubkhantonk
- Dec 28, 2025
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दिनांक : 28.12.2025

मानव के रोगो का किसी न किसी प्रकार से प्रेम के अभाव से गहरा ताल्लुक रहा है। चाहे मानव प्रेम कर नहीं पाया हो या फिर प्रेम को बांट नहीं पाया हो तो जीवन में दुख प्रविष्ट हो जाता हैं। प्रेम व करुणा का अभाव मन में ऐसी गॅाठे बाॅध देता है जिनका खुलना बहुत मुश्किल हो जाता हैं। यह अदृश्य गांठे न तो नजर आती हैं अैार न ही महसूस होती हैं। अेाशो जैसे महान रहस्यदर्शी ही मन की गहरी परतो में जाकर उदघोषणा करते हैं कि भीतर की यह गांठें शारीरिक अैार मानसिक बीमारी के रुप में प्रकट होती हैं।
जैसे बिना भोजन के शरीर कमजोर अैार कुरुप हो जाता हैं उसी प्रकार बिना प्रेम अैार करुणा के आत्मा कमजोर अैार कुरुप हो जाती हैं। अेाशो के अनुसार दुख मात्र प्रेम के अभाव के सिवा अैार कुछ नहीं हैं। जब तक प्रेम के बीज अंकुरित नही होगें तब तक आत्मा के अस्तित्व का अभास ही नहीं होगा। अेााशो ने करुणा को प्रेम का शुद्दतम रुप कहा हैं। करुणा में दैहिक अैार आध्यात्मिक दोनो प्रेम समाहित हो जाते हैं। एक अर्थ में करुणा को प्रार्थना भी माना जा सकता हैं। करुणा को उर्जा का उच्चतम रुप भी माना गया हैं।
सभी सदगुरुअेा ने कहा हैं कि करुणावान मनुष्य सिर्फ दाता होता हैं। करुणावान मनुष्य कुछ देकर आनंदित होता हैं। ओशेा एक उदाहरण देते हैं कि करुणा में हम अनुगृहित होते हैं। इसका मूल कारण यह है कि दूसरे ने हमारे से कुछ लिया हैं। जैसे हम किसी के लिए फूलो का गुलदस्ता लेकर जाए अैार वह हमारे गुलदस्तें को स्वीकार कर ले। इन भावो से अेात् प्रोत व्यक्ति इसलिए अनुगृहित होता है कि सामने वाले ने उसके प्रेम को ग्रहण कर लिया। करुणावान को समृद्द कहा गया हैं। वह जीवन के शिखर पर हैं। वह सिर्फ बांटता है अैार बिना प्रतिक्रिया देखे, आगे बढ जाता हैं।
इस प्रकार वे धन्यभागी है जिनके भीतर करुणा के भावो का उ्दभव हुआ हैं। जो करुणा की उर्जा को जगाना चाहते है उनके लिए अेााशो ने सरलतम प्रयोग सुझाए है, जिनका अभ्यास किया जाए तो जीवन को करुणायुक्त किया जा सकता है। यह प्रयोग विधिया मेरे जीवन में कैसे सार्थक हुई, मैनें उसका संक्षिप्त विवरण दे दिया हैं। कामना करता हूं कि आप द्रारा किए जाने वाले अभ्यास सफल होगे अैार आप भी करुणा के माध्यम से प्रेमरस का पान कर सकेगें।
जब हम भावों के शुद्दिकरण के मार्ग पर निकल गए है तो हमें पहले मैत्री, फिर करुणा अैार उसके बाद आनंद मग्नता की साधना करनी होगी। आज निन्नावें प्रतिशत लोगो के चेहरे बुझे हुए आभाविहिन नजर आएंगें। वें दुख अैार संताप की चादर अेाढे हुए प्रतीत होगें। लगभग सभी के साथ ऐसा ही हैं। अब क्या करे कि जीवन में आनंद अैार उत्सव घटित हो सके ताकि भाव शुद्दि के तीसरे सोपान पर भी सफलता की पताका पहनाई जा सके। इसका मूल कारण यह हैं कि उदास अैार विषाद से भरा हुआ चित्त कभी भी किसी बडे अभियान पर नहीं निकल सकता हैं। यदि गहराइ से विचार करे तो प्रकट होगा कि उदासी अैार खुशी एक आदत है। हमनें उदास रहने का अभ्यास किया तो उदासी की आदत हमारा स्वभाव बन जाती हैं। हम चाहें तो प्रसन्नता को भी अपने स्वभाव में आसानी से समाहित कर सकते हैं।
आगे जारी है.........
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Very inspiring
अच्छा लेख
यह लेख प्रेम और करुणा को जीवन की मूल चिकित्सा के रूप में स्थापित करता है। ओशो के विचारों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि मन की अदृश्य गाँठें ही शरीर और चेतना में रोग बनकर उतरती हैं। करुणा केवल भावना नहीं, बल्कि वह ऊर्जा है जो मनुष्य को दाता बनाकर समृद्धि के शिखर तक पहुँचा देती है। यह लेख हमें उदासी की आदत से मुक्त होकर आनंद और उत्सव के जीवन की ओर लौटने का साहस देता है।