What Are Emotions Called? (Part - 15) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 15)
- ayubkhantonk
- Dec 15, 2025
- 3 min read
Updated: Dec 21, 2025
दिनांक : 14.12.2025

बात करुणा एवंम दया की चल रही थी। अेाशो ने बार बार कहा है कि अब तक जितनी भी क्रांतिया हुई है, वे सब क्रेाध का परिणाम थी। इन क्रांतियो के परिणाम कभी भी विधायक नहीं रहे हैं। क्योंकि करुणा, उन क्रांतियो के उदभव का कारण नहीं थी। अेाशो ने जोर देकर कहा कि करुणा की उत्पति ही स्वयं, क्रांति का उदघोष हैं। थोपी गई क्रांतियाे के परिणाम कभी भी उत्कृष्ट नही रहे हैं । अेाशेा के अनुसार जीवन में करुणा एवंम दया के बीज अंकुरित होकर पौधे का आकार लेने लगते हैं तब जीवन में रुपांतरण का श्रीगणेश होता हैं। अेाशो ने तो यहाॅ तक कहा हैं कि जब आप किसी के साथ प्रेम से भरते है तब यदि आपके आंसु बहने लगे तो उन आंसुअेा से सुंदर न कविता होगी अैार न कोई गीत होगा।
हमारी शिक्षा पद्दति, हमारे संस्कार अैार हमारी परवरिश के ढंग से करुणा के केंद्र विकसित नहीं हो पाए। इस परिवेश ने निंदा के केंद्र को फलने फुलने में सहयोग किया हैं। क्षणभंगुर जीवन में यदि ह्रदय के तार करुणा के भाव से झंकृत नहीं हो पाए तो ऐसे जीवन की साथर्कता ही क्या हैं? परमात्मा ने तो करुणापूर्ण ह्रदय शरीर में स्थापित करके हमें पृथ्वी पर भेजा था लेकिन हमारे ह्रदयो में क्रूरता की उत्पति होना एक दुखःद घटना हैं। अेाशेा ने महाबलेश्वर के एतिहासिक ध्यान शिविर में करुणा की उत्पति के सूत्र बताते हुए कहा था------
‘’अपने चारो तरफ करुणा फेंकें। कितने दुःखी है लोग। उनके दुख को ज्यादा मत बढाना। आपकी करुणा उनके दुख को कम करेगी। एक करुणा से भरा हुआ शब्द उनके दुख को कम करेगा। हम सब, एक दूसरे के दुखो को बढा रहे है। .हम सब एक दूसरे को दुख देने में सहयोगी हैं। एक-एक आदमी के पीछे अनेक-अनेक लोग पडे हुए हैं, दुख देने के लिए। अगर करुणा का बोध होगा, तो आप किसी को दुख पहुंचाने के सारे रास्ते अलग कर लेंगें। अगर आप किसी को जीवन में कोई सुख दे सकते हैं तो उसका उपाय करेंगें।'’
इस शिविर में अेाशो लोगो चेतावनी भी देते है कि-----
‘’एक बात अैार ध्यान में रखे कि जो दूसरो को दुख देता हैं, वह आखिर में खुद ही दुखी हो जाता हैं। जो दूसरो को सुख देता हैं, वह अंतंतः सुख को ही उपलब्ध होगा। इसका कारण यह है कि जो मानव दूसरो को सुख देनें की चेष्टा करता हैं, उसके भीतर सुख के केंद्र विकसित होते हैं। फल बाहर से नहीं आते हैं। फल भीतर ही पैदा होते हैं। हम जो करते हैं, उसी की कामना हमारे भीतर विकसित होती चली जाती हैं। जो प्रेम चाहता हैं, वह प्रेम को फैला दे। जो आनंद चाहता हैं, वह आनंद को फैला दें। जो यह चाहता हो कि उसके घर फूलो की बारिश हो, तो वह लोगो के घर मे फूल फेंकना आरंभ कर दें। अन्य कोई रास्ता नहीं हैं। प्रत्येक को करुणा का भाव विकसित करना होगा। '’
अेाशो, ह्रदय में करुणा के फूल खिलने की सरल अैार व्यावहारिक विधिया बता रहे हैं। हम, जिसके प्रति, जो भाव ह्रदय में सजोये रखते है, वैसे ही परिणाम सामने आते हैं। सब कुछ हम पर निर्भर हैं। जैसे बीज बोएंगे, वैसी ही फसल काटेगें। अेाशो तो करुणा को स्वास्थय से भी जोडते हैं। उनका तो यहाॅ तक कहना हैं कि सिर्फ करुणा ही एक मात्र भाव है, स्वस्थ होने का। शरीरिक रोग के कई कारण हो सकते है लेकिन प्रेम का अभाव, सबसे महत्वपूर्ण कारण् है। अेाशो प्रेम के अभाव को रोग का संभावित कारण नही बता रहे है, वे दावे के साथ कह रहे हैं कि रोग का एक मात्र कारण प्रेम का अभाव हैं। या तो ऐसे मनुष्य के जीवन में प्रेम प्रविष्ट ही नहीं हुआ या फिर उसने जीवन में प्रेम व करुणा के प्रविष्ट होनें के सब खिडकी दरवाजे बंद कर दिए हैं।
आगे जारी है.........
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True, life is meaningful only because of compassion
“ओशो ने करुणा को जिस अर्थ में क्रांति कहा है, यह लेख उसी आंतरिक रूपांतरण की गूढ़ व्याख्या करता है। क्रोध से जन्मी क्रांतियाँ केवल सत्ता बदलती हैं, चेतना नहीं। जब हृदय में करुणा अंकुरित होती है, तभी जीवन में वास्तविक परिवर्तन घटित होता है। यह लेख आत्ममंथन के लिए विवश करता है और हमें हमारे भीतर झाँकने का साहस देता है।”
Nice