What Are Emotions Called? (Part - 06) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 06)
Updated: Aug 24, 2025
दिनांक : 13.08.2025

राहगीर और आगे बढा तो उसने देखा कि एक व्यक्ति पत्थर तोडता हुआ कोई लोकगीत गुनगुना रहा है। देखने में थका हुआ भी नजर नहीं आ रहा हैं। हथोडे की चोट पत्थर पर मारकर परिणाम की प्रतीक्षा भी कर रहा हैं। किसी भी दृष्टिकोण से परेशान नजर नहीं आ रहा हैं। राहगीर ने मुस्कुराकर पूछा-
‘‘ क्या कर रहे हो मित्र।'’
‘‘ इस गॉव में भगवान का पहला मंदिर बन रहा हैं। उसी मंदिर के लिए पत्थर तराश रहा हूॅ। मेरे हाथ का तराशा हुआ पत्थर, भगवान के मंदिर के निर्माण में सहयोगी होगा।‘‘
वह अपने अधूरे लोकगीत को पूरा करने में लग गया।
‘‘इस कडी धूप में परेशानी तो हो रही होगी, मित्र। ‘‘ उसने मानवता के नाते पूछ लिया।
‘‘कौनसी परेशानी, मेरे मित्र। बरसो से इस पहाडी के पत्थर तोडकर परिवार की गुजर बसर कर रहें हैं। इन पत्थरो से ही तो मेरा परिवार पलता हैं। अब तो इन पत्थरो से भगवान का मंदिर बन रहा है। जब मंदिर पूर्ण हो जाएगा । फिर, पूजा अर्चना शुरु हो जाएगी, तब मैं, आनंदित होऊंगा कि मेरे तराशे हुए पत्थरो से मंदिर की बुनियाद रखी गई थी। मेरे तोडे हुए पत्थर इस पवित्र मंदिर में लगे हुए है।‘‘ बोलते बोलते उसकी खुशी परवान चढने लगी।
राहगीर आश्चर्यचकित हुआ। उसने कभी ख्याल नहीं किया था कि तीन व्याक्ति, भरी दोपहर में पहाडी से पत्थर तोड रहे हैं। लेकिन तीनो की भाव दशा नितांत भिन्न हैं। पहला तो इतना दुखी हैं कि पूछने वाले को अंधा बताकर, अपनें कार्यो का पिछले जन्मो के कर्मो से संबंध स्थापित कर रहा है। दूसरा भी दुखी है। लेकिन उसके दुख की मात्रा थेाडी कम हैं। तीसरे को न धूप से परेशानी है न पत्थर तोडने सें। वह कार्य को पूजा समझकर कर रहा है। उसे कोई गिला शिकवा नहीं है। राहगीर इस नतीजे पर पहुॅचा कि तीनो व्यक्तियों के सोचने का अंदाज अलग अलग होने से किस तरह जीवन की दशा और दिशा प्रभावित होती हैं l उसके समझ में आ गया कि पूरा मामला भावना अैार सोचने के ढंग पर आधारित हैं।
राहगीर सामान्य व्यक्ति नहीं था संत व्यक्ति था। तीनो मजदूरो के भावो का गंभीरतापूवर्क अध्ययन कर रहा था। तीनो व्यक्तियों के भावो के मध्य उत्पन्न हुए फर्क को समझने की कोशिश कर रहा था। उसने यही, निष्कर्ष निकला कि जो लोग कार्य को ही ध्यान बनाकर उससे आनंदित होते है तब गिले शिकवो की उत्पति ही नहीं होती। तीसरे व्यक्ति की पत्थरो से मैत्री स्थापित हो गई। इतनी शक्ति है, मैत्री में।
हमें खुद को ही खोज करनी होगी कि हम वैमनस्य से प्रभावित होते है या मैत्री से। यदि हमारा जीवन वैमनस्यता और घृणा से अधिक प्रभावित होता हैं तो हमें समझ लेना चाहिए कि जीवन दुख के मार्ग पर जा रहा है। यह सही है कि वेमनस्यता और शत्रुता में अपार शक्ति होती हैं। ओशो तो स्पष्ट कहते हैं कि जब सच्ची या झूठी, शत्रुता को आमजन के मस्तिष्क में बैठा दिया जाए, तो आमजन स्वयं को शक्तिशाली समझने की गलतफहमी पाल लेगा। बार-बार, पडौसी देश के हमले की आशंका का बीज आमजन के जहन में अंकुरित कराने का प्रयास ही आमजन में पडोसी देश के प्रति घृणा और वैमनस्यता पैदा कर देगा। इस प्रकार शत्रुता के भाव में शक्ति तो है लेकिन मैत्री भाव में उससे कई गुना अधिक शक्ति है।
आगे जारी है.........




ख्याल ही जिंदगी को मुकाम फराहम करता है।
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सोच और भावनाएँ हमारे जीवन की दिशा और सुख-दुख तय करती हैं।