विचारो के कैसे पाक-साफ करे? भाग-6
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दिनांक : 14.06.2026

अेाशो के अनुसार शुभ विचारो की त्रिवेणी तो सत्यंम, शिवम, संदरम का चिंतन है। इस त्रिवेणी पर किया गया, चिंतन हमें सत्यम, शिवमं सुंदरम के पावन विचारो के भवन में प्रवेश दिलवा देगा। इस भवन में प्रवेश करने की भी शर्ते है।
हमें इस बिंदू पर चिंतन करना होगा कि सत्यम, शिवम, सुंदरम की अवधारणा को क्यो पवित्र विचारो का सूत्रधार माना गया है। हमारा चिंतन सत्यम, शिवंम, सुंदरम पर ही होना चाहिए । इस पावन अवधारणा के समुद्र में गोते लगाकर मोती ढूॅडने में अपनी उर्जा को लगाए। निरंतर चितन ही एक मात्र उपाय है। ऐसा कोई दृष्टांत नही मिलता हैं कि किसी ने इस अवधारणा पर चिंतन करने में अपनी जीवन उर्जा को खर्च किया हो अैार उसके मस्तिष्क नें शुभ को गृहण करने से इंकार कर दिया हो। अेाशो ने दावा किया है कि सत्यम, शिवम, सुंदरम पर निरतंर चिंतन करनें से जीवन में शुभ विचारो का आगमन न होना असंभव है। उसके शुभ विचारो की छाप उसकी दिनचर्या के प्रत्येक कृत्य पर नजर आने लगेगी। उसके जीवन को रुपांतरित होने से कोई रोक नहीं सकता।
वैसे तो अेाशो अटठावन वर्ष कुद माह ही हमारे पृथ्वी ग्रह रहे हैं। उसके बावजूद उनके जीवन किस्से एक व्यक्ति के रुपांतरण के लिए काफी हैं। लगता तो ऐसा हैं कि यह सब उनकी जीवनचर्या का सामान्य अंग था। चालीस साल अेाशो को पढने समझने अैार जीने के बाद, मै अनुभव के आधार पर कह सकता हूॅ कि उनके जीवन किस्से स्वंय उनके द्रारा पैदा किए गए हैं। इसे यॅू भी कह सकते हैं कि अेाशेा पहले तो एसे हालात पैदा करते हैं जिससे उनके मन माफिक स्थिति उत्पन्न हो सके। जब मन माफिक स्थिति पैदा हो जाती थी तब उन्हे जो कहना या करना होता था, उसे वे कहते या करते थे। उन हालातो के पर्दे के पीछे क्या था ? उन हालातो के पैदा होने का मूल अैार आधारभूत कारण क्या था? इनकी झलके उनके जीवन किस्सो से मिलती है। विचारो के प्रसंग पर ही उनका एक प्रेरणादायक किस्सा संवादशैली में पढिए-
एक घ्यान शिविर चल रहा हैं। माईक पर आयोजको की अेार से समय-समय पर साधको के लिए निर्देश जारी किए जा रहे थे। माईक पर आयोजक ने अनुरोध किया--
‘’ यह बहुत दुख की बात हैं कि कई लोग अभी तक नहीं आए है। हम दो बार अनुरोध कर चुके है। आपके नहीं आने से कार्यक्रम आरंभ करने में अनावश्यक दस मिनिट का विलंब हो गया1।'’
आयोजक का लहजा शिकायत करने वाला था।
अेाशो कहते हैं कि यदि मैं, आयोजक होता तो यह अनुरोध शिकायतभरा न होकर इस तरह होता---
‘’ मुझे खुशी हैं कि सिर्फ दो बार अनुरोध करने पर ही इतने लोग आ गए। मुझे इससे भी ज्यादा खुशी होगा कि जो लोग अभी तक नहीं आ पाए हैं, वे भी आ जाए।'’
आयोजक के लहजे को अेाशो ने हिंसात्मक अैार अपने लहजे को अहिंसात्मक घोषित किया। अेाशो चिंतन के ढंग के प्रभाव से पर्दा सरकाते हुए कहते हैं कि यदि आप सोचने के नजरिये में परिवर्तन करेंगे तो पाएगें कि जीवन की छोटी-छोटी चीजेा में परिवर्तन की झलके नजर आनी शुरु हो गई हैं। वाणी, अहिसात्मकता की अेार गति कर रही है। मॅुह से निकले हुए शब्द, सुनने वालो को प्रीतिकर लगने लगे हैं। अपनी बात पूरी करने के बाद शांति अैार तृप्ति का अहसास हो रहा हैं।
कोई व्यक्ति कार चलाते समय एक्सीलेटर अैार ब्रेक का एक साथ उपयोग करे तो कार का गति करना संभव नहीं है। इसी प्रकार यदि हमारे जहन में धन में वृद्दि करने की प्रबल आकांक्षा प्रवाहित हो रही हो या हम जागते हुए भी धन अैार यश के स्वप्न देखने के अभ्यस्त हो चुके हो तो इन स्वपनो के चलते हुए समाधि प्राप्ति की दिशा में किए गए प्रयोग समय बर्बादी के सिवाय, कोई परिणाम नहीं लाएगे।
जारी है ...................
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