विचारो के कैसे पाक-साफ करे? भाग-4
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दिनांक : 31.05.2026

ऐसा लगता था कि जैसे इस विचार ने उसके दिलो-दिमाग में अपना स्थाई आवास बना लिया हो। उसका चिंतन इसी विचार के इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहता था।
हाॅस्टल अैार काॅले्ज फीस के लिए उसके पिता, प्रति माह मनीआर्डर भेजा करते थे। इतफाक से पोस्ट आफिस की हडताल होने से उसे मनिआर्डर नहीं मिल पा रहा था। वह आर्थिक तंगी के दैार से गुजरने लगा। पोस्टऑफिस की हडताल समाप्त होनें का नाम नहीं ले रही थी। काॅलेज अैार हॅास्टल की फीस बकाया हो गई थी। हॅास्टल वार्डन ने चेतावनी दे दी कि तीन दिन में बकाया जमा नहीं कराया तो उसकी हॅास्टल से छुटटी कर दी जाएगी। अब ताे चिंता की लकीरे घनी होती चली गई। पढाइ से मन उचाट हो गया था। आर्थिक संकट गहराता जा रहा था।
दिमाग में एक ख्याल आया कि इस दुष्ट महिला से कर्ज लेकर हाॅस्टल अैार कॅालेज की फीस जमा करा दी जाए। जब मनीआर्डर आ जाएगा तब इस दुष्ट आत्मा के मुॅह पर पैसे फेंक दॅूगा। उसके कदम स्वतः ही उस दुष्ट आत्मा के बॅगले की अेार उठते चले गए। उसने, महिला को अपनी परेशानी का वृतांत सुनाया लेकिन महिला का भावहीन चेहरा, उसके दुखद वृतांत से अप्रभावित रहा। महिला ने सपाट स्वर में पूछा-- ‘’ गिरवी क्या रखोगे'’?
वह असमंजस में पड गया। एक वि़धार्थी के पास गिरवी रखने के लिए हो भी क्या सकता है। तभी हाथ पर बंधी घडी पर उसकी नजर पडी। उसने संकुचाते हुए कहा--’’ यह घडी चलेगी?’
महिला ने हॅा, में गर्दन हिला दी। युवक ने सोचा कि मनीआर्डर आने पर पैसे महिला के मुॅह पर मारकर घडी वापस ले लॅूगा। उसने कलाइ से घडी खोली अैार महिला की अेार बढा दी। महिला, अनुभवी थी। वह घडी गिरवी रखने से पहले उसकी कीमत का आंकलन करना चाहती थी। शाम के वक्त दीपक जलाने की भी जरुरत नहीं समझती थी। क्यों फिजूल में तेल जाया किया जाए। वह घडी को खुली खिडकी के पास लेकर गई अैार सूर्य देवता की बची खुची रोशनी में घडी के मूल्य का आंकलन करने लगी। उसका आधा शरीर खिडकी में अैार आधा शरीर,अंधेरे कमरे में था। तभी, युवक के जहन में विधुत गति से एक विचार कोंधा कि इस महिला को थोडा सा धक्का दे दिया जाए तो इसकी जीवन लीला का अंत हो सकता हैं। यहॅा, कोई है, भी नही, इसलिए सब लोग, इसे एक दुर्घटना स्वीकार कर लेंगें। युवक ने आव देखा न ताव महिला के नीचे वाले शरीर को थोडा उॅचा करके उसे खिडकी की अेार पुश कर दिया। महिला धडाम से सडक पर जा गिरी। उसका भेजा, तरबूज की तरह फूट गया। उसके प्राणपखेरु उड गए।
अब वह किकर्तव्यविमूढ हो गया।
अरे यह क्या हो गया।
अब पुलिस मुझे दबोच लेगी।
पूरी जिंदगी जैल की चक्की पीसनी पडेगी।
भॅाति-भॅाति की आशंकाअेा ने उसे चारो तरफ से जकड लिया। पसीने-पसीने होकर हाॅस्टल की तरफ इतनी तेजी से भागा, जैसे उसके पीछे, भूत पडे हुए हो। हाॅस्टल पहुॅचकर उसने अपने सहपाठियों को हाॅफते हुए कहा--
’’-मैने कुछ नहीं किया। मैंने कुछ नहीं किया। मैंने कुछ नहीं किया।''
सहपाठियो का आश्चर्य भी सातवे आसमान पर पहॅुच गया । वे एक दूसरे के मुॅह को अेार देखने लगे। उन्होने सोचा कि इसने कोई डरावना ख्वाब देख लिया है। यह उस ख्वाब से डर गया हैं। सहपाठियों ने युवक को पानी पिलाया अैार महसूस किया कि उस युवक की साॅस धोकनी की तरह तेज-तेज चल रही थी। सहपाठी चले गए। उसने अपने कमरे में जाकर कुॅडी लगा ली।
जारी है ...................
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