What Are Emotions Called? (Part - 05) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 05)
- Aug 7, 2025
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Updated: Aug 13, 2025
दिनांक : 07.08.2025

मै न तो किसी को अपना स्पष्टीकरण दे रहा था और ना ही उनसे कोई प्रतिप्रश्न कर रहा था। हॉ, इतना जरुर था कि जो व्यक्ति, चित्त की शांति के प्रति उत्सुक होता और मौन का स्वाद चखने की आकांक्षा करता, उसे मै मैत्रीपूर्ण होने के सूत्र अवश्य समझा देता था। कई बार तो शुभचिंतका ने यहॉ तक कह दिया कि मै उनसे अलौकिक सूत्रो के बारें में काल्पनिक बाते कर रहा हूॅ। जिन युवाअेा को कभी, शांति की झलक मिलती, उनके परिजन यह जानने की कोशिश जरुर करते कि उनके पुत्र में यह परिवर्तन कैसे हुआ? वे अपनी संतानो से कई प्रकार के प्रश्न भी पूछते लेकिन युवक संतोषजनक जवाब देने की स्थिति में नहीं होते थें।
शायद 1984 का साल था। मेरी आयु बीस वर्ष हो रही थी। कई मित्रो ने पूछा कि तुम प्रत्येक कार्य को पूरे मनोयोग और आनंद से संपादित करने की बात कहते हो। हम ऐसा करते भी हैं। हमें, अब कुछ-कुछ अच्छा लगने लगा है लेकिन हमारे परिजन नाराज हैं। उनका कहना है कि हम लोग उदास और निष्क्रिय होते जा रहे है। क्या जवाब देवे? हमें पूछते है कि तुम्हे कोई षडयंत्र के जाल में फंसा रहा है।
मैने मित्र से पूछा-‘‘तुमने क्या जवाब दिया?‘‘
‘‘हमने तो तुम्हारा नाम बता दिया। हमने कहा कि तुम, हमें मन की शांति का पाठ पढा रहें हो। चीजो को देखने का नया अंदाज सीखा रहे हो। हम परिजनो को समझाने का प्रयास कर रहे है कि जब हम प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति, पेड पौधो और पशु पक्षियो को मैत्रीपूर्ण दृष्टि से देखते है अैार मन मे भाव करते है कि हमारा किसी के साथ कोई बैर नही है। हमारी सब के साथ मैत्री हैं। मेरे ताउजी के मन में कई आंशकाए पैदा हो रही है। वे हमसे मैत्री पर कई सवाल पूछते है,लेकिन हम उनके सवालो का जवाब देने में सक्षम नहीं हैं। मेरे पिता और ताउजी तुमसे मिलना चाहते है। मैत्री अैार चित्त की शांति पर विचारविमर्श करना चाहते हैं।‘‘
‘‘ठीक है। कल रविवार है। कॉलेज की छुटटी है। मै ही तुम्हारे घर आ जाता हूॅ। ‘
‘‘शाम को पॉच बजे आ जाना। ‘‘ मित्र ने समय नियत कर दिया।
मैंने उस रात ओशो का एक प्रवचन सुना। प्रवचन में ओशो किसी विषय को एक बोधकथा के माध्यम से समझाने का प्रयास कर रहे थे। ओशाे, अपनी अमृत वाणी में कह रहे थे कि एक राहगीर छोटी सी पहाडी को देखने गया। राहगीर, जिज्ञासु प्रवृति का व्यक्ति था। उसने देखा कि उस छोटी सी पहाडी के समीप ही किसी मंदिर के निर्माण का कार्य चल रहा हैं। पहाडी पर कई मजदूर पत्थर तोड रहे थे। उस राहगीर ने पत्थर तोड रहे एक व्यक्ति से पूछा-
‘‘क्या कर रहे हो, मेरे मित्र?‘‘
‘‘दिख नहीं रहा क्या, पत्थर तोड रहा हूॅ। एक तो कठोर पत्थर और उपर से यह धूप, कोढ में खाज का काम कर रही हैं। भुगत रहे है, पिछले जन्मो के कर्मो का फल।‘‘
‘‘नाराज क्यों हो रहे हो मित्र। मैने तो यू ही पूछ लिया था।‘‘
‘‘साफ दिख रहा है कि कडी धूप मे पत्थर तोड रहा हूॅ। फिर भी पूछ रहे हो। लगता हैं, ऑखों की रोशनी कमजोर हो गई हैं।‘‘
राहगीर उसकी पीडा को सुनकर आगे चल पडा। पहाडी के उपर चढा तो दूसरा व्यक्ति पत्थर तोडता हुआ दिखाई दिया। उसने रुककर, उससे विनम्र शब्दो में पूछा-‘
‘’क्या कर रहे हो मित्र।
'‘पास में ही मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा हैं। उसके लिए पत्थर तोड रहा हूॅ।‘‘
उसने निराशात्मक लहजे में जवाब दिया।
आगे जारी है.........



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Obliged R/sir
😊
दृष्टिकोण बदलने से अनुभव को भी बदला जा सकता है ...☺️