विचारो के कैसे पाक-साफ करे? भाग-5
दिनांक : 07.06.2026

दूसरे दिन उसे पुलिस की गाडी का होर्न सुनाई दिया तो वह बेहोश होकर सडक पर गिर गया। पुलिस ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया लेकिन होश आने के बाद भी वह बडबडाता रहा कि मैने कुछ नही किया। मैंने कुछ नही किया।
कइ हफतो तक वह तोते की तरह यही कहता रहा कि मैंने कुछ नहीं किया। मैनें कुछ नहीं किया। वह तो खिडकी मे से अपने आप गिर गइ थी। तब पुलिस को शक हो गया कि इसी ने वृद्व महिला का खात्मा किया हैं। उसे हत्या के इल्जाम में गिरफतार कर लिया गया।
हकीकत यह थी कि पुलिस अैार पडौसी यह मान चुके थे कि महिला खिडकी से बाहर झॅाक रही थी अैार इसी दैारान वह नीचे गिर गइ। युवक के दिमाग में यह विचार तो लम्बे अरसे से सरगोशी कर रहा था कि इस महिला को पृथ्वी गृह पर रहने का कोइ अधिकार नहीं हैं। धीरे-धीरे, उसका अचेतन इस विचार को क्रियान्वित होता हुआ देखना चाहने लग गया। इस विचार की परिणिति इस दुखद घटना में तब्दील हो गइ।
इस प्रकार हम यह कहना चाह रहे हैं कि हमारे विचार धीरे-धीरे अवचेतन में संगृहित होकर फलीभूत हो जाते हैं। इसलिए विचारो की शुद्वि आनंदपूर्ण जीवन का अहम हिस्सा हैं।अशुभ विचारो की नो एंटरी अतिआवश्यक हैं। अशुभ विचार, दिमाग की किसी खिडकी से जबरदस्ती आ भी गए तो उनसे दूरी बनाना ही उचित होगा। अन्यथा एसे विचार हानिकारक सिद्व हो सकते हैं। जीवन में आनंद की तरंगे तो शुभ विचारो का ही प्रसाद हैं।
अेाशो कहते है कि विचार भी तरंगो की भाॅति है। विचार मानव के चित्त् को प्रभावित करते हैं। यदि कोइ व्यक्ति अशुभ विचारो से ग्रसित रहता है तो उसकी जीवन दशा, अशुभ के मार्ग पर गमन करेगी। परमात्मा के प्रसाद से जीवन में शुभ विचारो का आगमन हुआ हैं तो जीवन शुभ अैार आनंदित करने वाले राजपथ की अेार गति करने लग जाता हैं।
व्यक्तित्व को निर्मीत करने में विचारो की अहम भूमिका होती हैं। यदि हमारा फोकस सौदंर्य पर होगा तो उसके जेहन में सौदंर्य के बीज पडने आरंभ हो जाएंगें। हमारे विचारो की बुनियाद पर ही हमारे व्यक्तित्व का भवन खडा होता हैं। सत्य पर सतत चिंतन से जीवन धारा सत्य की अेार बहने लगती है। सुदंरम का निरंतर चिंतन जगत में सुदरता के फूल खिलवा देगा।
एक स्थिति इसके प्रतिकूल भी है। जब विचारो का कारवाॅ वैमनस्यता, असत्य, हिंसा अैार कुतर्कता की अेार प्रवाहित होता हैं तो यह नकारात्मक विचार ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करते है जिससे जीवन नर्क से भी बदतर हो सकता है। इसलिए हमें अपने चिंतन का दायरा सोचसमझ कर निर्मित करना होगा। हमें स्वंय ही मंथन करना होगा कि हमारे चिंतन का केंद्र बिंदू क्या हैं? सब कुछ, हम पर निर्भर हैं। हमारे चिंतन का केंद्र धन अैार यश की ही परिक्रमा करता रहेगा तब धन व यश के चिंतन वृक्ष की छाया तले धन व यश के इर्द-गिर्द विचारो का प्रवाह घूमता रहेगा।
अेाशो ने किसी प्रवचन में एक बोध कथा सुनाई थी। एक शख्स को अपनी छाया अैार पदचिंन्हो से भूत सा डर लगता था। उसने इस डर से मुक्ति पाने तरीका अविष्कृत किया। वह छाया अैार पदचिन्हो देखकर बेतहाशा भागना शुरु कर देता। लेकिन छाया अैार पदचिन्ह फिर भी उसके हमसफर बने रहते। छाया व पदचिन्ह उसका पीछा नहीं छोड रहे थे।
वह दुखी अैार हताशा हो गया। यह कथा च्वांगत्सू के कलम से निकली हैं। यह महान संत इस कथा में कहते हैं -
'’ हे, पागल आदमी यदि तू, मेराथन का धावक न बनकर, किसी छायादार पेड की छॅाव में शांत होकर बैठ जाता तो तेरी छाया निर्मित ही नहीं होती। तू डर के फेाबिया के जाल से बाहर निकल सकता था। '’
अेाशो कहते हैं कि हमारी जीवन यात्रा धन, यश अैार काम के जहाज पर सफर करती हैं। विचार भी इनके इर्द-गिर्द विचरण करते हैं। विचारो की विषयवस्तु अशुभ है। विचारो को, इस त्रिमूर्ति के दायरे से बाहर निकालना, विचारो के शुद्दिकरण की दिशा में उठाया गया, एक कदम हेा सकता हैं। यदि चिंतन की सुई शांति, प्रगति, प्रेम, मैत्री अैार करुणा की तरफ घूमेगी तो विचारो का प्रवाह भी इन पर केंद्रित होना आरंभ हो जाएगा। इन भावो को अपने चिंतन की विषयवस्तु बनाने से विचार भी उनका अनुगमन करने लग जाएंगे।
निष्कर्ष के रुप में कहा जा सकता हैं कि चिंतन की गति के समानान्तर ही विचार चलते रहते हैं। बार-बार चिंतन की घडी की सुई जिस अंक पर रुक जाती हैं, विचारो का निर्माण भी तदुनुरुप होने लगता हैं। कभी किसी को धोखा देने की ईच्छा पर चिंतन करे तो हम पाएंगे कि धोखे के वृक्ष की शाखाऍ-प्रशाखाऐ, हमारे चारो अेार फेलने लगी हैं। धोखे के वृक्ष की शाखाअेा से हम घिरते जा रहे हैं। इसके बाद मस्तिष्क में धोखा देने के विचार गर्दिश करने लग जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होंना चाहिए। इस प्रकार के विचार जीवन सत्य से दूरियां बढा देते है।
जारी है ...................
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