What Are Emotions Called? (Part - 04) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 04)
Updated: Aug 7, 2025
दिनांक : 30.07.2025

ओशो कहते है कि मैत्री की साधना से सरल कोई साधना नही है। हम दैनिक दिनचर्या का कोई भी कार्य कर रहें हो या एकांत में बैठे हो तो अनुभव करे कि मेरे चारो तरफ एक मैत्री का घेरा निर्मित हो रहा है। पूरी कायनात मेरे साथ मैत्रीपूर्ण हैं। मेरे भीतर भी संपूर्ण कायनात के प्रति मैत्री के फूल खिल रहे हैं। मुझे मैत्री के फूलो की खुशबू आनंदित कर रही हैं। इस खुशबु से, मेरे भीतर शांति की लहर दौडने लगी हैं। ऐसी प्यारी कल्पना से हमारे भीतर मैत्री के बीज अंकुरित होना आरंभ हो जाएगे। जो कुछ भी नजर आए। उसके प्रति भाव करे कि मै उसके प्रति मैत्री से सरोबार हूॅ। मैत्री से भरा हुआ हूॅ। लोगो से मिले तो अनुभव करे कि आपका उनके प्रति मैत्री भाव दिन दूना रात चौगुना बढने लगा है। इसका परिणाम यह होगा कि आपका चित्त मैत्री के अनुपात में शांत होना आरंभ हो जाएगा । आपके भीतर प्रेम की कौपले फूटने लगेगी। आप मात्र कल्पना करने से ही मेत्री जगत में विचरण करने लगेगे। जो अकेलापन काटने को दौडता था। वही अकेलापन, एकांत में रुपानतरित् होकर आनंद और शांति का प्रतीक बनता बन जाएगा।
जब मेरे हाथ, मैत्री की कीमिया लगी तो मैने इसकी सत्यता को परखने के लिए प्रयोगो का शुभारंभ कर दिया। ओशो द्वारा इजाद की गई कीमिया नूतन और मौलिक थी इसलिए सुसंगत दृष्टांत किसी भी शास्त्र में नही मिले। बिना किसी पूर्व दृष्टांत के प्रयोग आरंभ करने पडे। मुझे सडक पर कोई कुत्ता भी नजर आता तो मै उसके प्रति भी मैत्रीपूर्ण होकर देखता तो मुझे ऐसा प्रतीत होता कि कुत्ता भी मैत्रीभाव को मेरी तरफ प्रवाहित कर रहा है। बाजार और गली मोहल्लो से पैदल गुजरते हुए जिन कुत्तो से भूत जैसा भय लगता था। वह भय धीरे-धीरे तिरोहित होने लगा। मै प्रत्येक आवारा कुत्ते के प्रति मैत्री भाव से देखता और ह्रदय में उनके प्रति मैत्री भाव प्रवाहित करता तो न तो कुत्ते मेरी तरफ भौकते और ना ही मुझे डराने का प्रयास करते। मै उनके प्रति मैत्रीपूर्ण हुआ और वे मेरे प्रति मैत्रीपूर्ण हो चले गए।
अब मुझे किसी भी गली मोहल्ले से पैदल गुजरते हुए भय लगना समाप्त हो चुका था। जीवन में पहली बार शांति का अविर्भाव हुआ तो मैान, पंख पसारने लगा। अकेलापन खलता नही था बल्कि आनंद की अनुभूति कराता था। लेकिन परिजनो और हितेषियो के लिए मौन, अनुभव का विषय नही था। इसलिए उन्होने मुझ पर प्रश्नो की बौछार करना शुरु कर दिया। कोई मुझसे पूछता कि मै इतना उदास क्यो रहता हूॅ? कोई मुझसे पूछता कि तुम लोगो के कटु वचनो पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं करते हो? कोई कहता कि तुम इतने धीमे क्यों बोलते हो? कोई कहता कि तुम्हारी चंचलता कहॉ खो गई। किसी हितेषी का प्रश्न होता कि क्या मैं सन्यस्त होने की दिशा में आगे बढ रहा हूॅ? आसपास के लोग को मेरे चित्त की शांति, उदासी का पर्याय लग रही थी।
आगे जारी है.........




Nice
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Osho the master..