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What Are Emotions Called? (Part - 23) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 23)

  • Apr 5
  • 3 min read

Updated: Apr 19

दिनांक : 05.04.2026

जब यह खबर गॅाव में पहुॅची तो गाॅव की एक महिला ने कहा कि आज से चार दिन पहले जब रामदेव की तबीयत बिगड गई थी तब वह उसका हालचाल पूछनें उसके घर गई थी। तब रामदेव ने कहा था कि वह कई लोगो को ऐसे जाल में फॅसाकर जाएगा कि उनका उस जाल से निकलना मुशकिल हो जाएगा। वह सिर पीटकर कहने लगी कि वह जीवन भर लोगो को परेशान करता रहा अैार मरने के बाद भी परेशान कर गया। वह आधे गॉव को जाल में फॅसा गया l

हमने आपको दो लोगो के अंतिम समय की बोध कथाए सुनाई। एक तो वह साधु था जो ताजिदंगी लोगो को हॅसाकर आनंदित करता रहा। दूसरा रामदेव था जो जिंदगी भर लोगो को दुख देता रहा अैार मरने के बाद भी सुनियोजित योजना के तहत गाॅव के मोतबीर लोगो को हत्या के मुकदमें में फॅसा गया। सबकी सोच अैार लक्ष्य अलग-अलग हो सकते हैं। रामदेव पूरी जिंदगी लोगो को परेशान अैार दुखी करने के ढंग तलाशता रहा। इस नकारात्मक कार्य में उसकी उर्जा खर्च होती रही। वह भी परेशान अैार दुखी रहा। गाॅव के लोग भी दुखी रहे l

यह सत्य हैं कि जिनके जीवन में करुणा, मैत्री, प्रेम अैार प्रसन्नता का उदभव होता है तो वे लोगो में इनका वितरण करके स्वयं आनंदित होते हैं। जिसके जेहन में जो होगा, वही तो वह दे सकेगा। साधु के जेहन में प्रसन्नता अैार आनंद था जो वह अंतिम समय तक लोगो को बाॅटता रहा। रामदेव के जेहन में दुख, विषाद अैार वैमनस्य था जो वह अंतिम समय तक लोगो को देकर परेशान करता रहा।

हम बात कर रहे थे, भाव शुद्दि की। जब हमारी भावनाऍ शुद्द हो जाएगी, तब हमें जीवन के वास्तविक आनंद का बोध होगा। शुद्द भावों के साथ जीवन जीना ही प्रमाणिक जीवन माना गया है।

भावों को शुद्व करने का चौथा उपाय हैं- कृतज्ञता। भाव-शुद्दि के लिए मन में कृतज्ञता अर्थात धन्यवाद का भाव उत्पन्न होना सहयोगी है। अेाशो, सर्वप्रथम शरीर की महत्ता को रेखाकिंत करते हैं। ओशेा कहते हैं कि शरीर ही ऐसा उपकरण हैं, जिसके भीतर आत्मा का निवास हैं। सबसे पहले श्वासं पर ही विचार करे तो हम पाएगें कि यह स्वचालित है। हमें श्वांस लेने अैार छोडनें का कोई प्रयास नहीं करना पडता हैं। सब कुछ स्वतः हो रहा है। क्या जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृत्य के स्वंमेव संचालन के लिए परमात्मा के प्रति कृतज्ञता तथा धन्यवाद का भाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए? आवश्यक रुप से उत्पन्न होना चाहिए। यदि श्वांस स्वचालित प्रक्रिया न होकर व्यक्ति के कृत्य पर निर्भर होती तो जैसे ही हम किसी काम मे मशरुफ हुए अैार श्वांस लेना भूल गए तो जीवन लीला की इतिश्री होना अनिवार्य था। कहने का अर्थ यह है कि परमात्मा प्रदत्त स्वचालित श्वांस प्रक्रिया के लिए परमात्मा के प्रति हमारे मन में कृतज्ञता का भाव होना चाहिए।

कृतज्ञता का अर्थ होता हैं- किसी के द्रारा किए गए उपकार के प्रति अहसान मानने का भाव। कृतज्ञता को सभ्य समाज में शिष्टाचार के रुप में देखा जाता है। किसी ने हमारी सहायता कि तो उसके प्रति आभार प्रकट करना भी कृतज्ञता हैं। कोइ व्यक्ति बार-बार हमे मार्गदर्शन प्रदान कर हमारे कार्यो को सुकर बनाता है तो उस व्यक्ति के प्रति श्रृदा उत्पन्न होना लाजमी है। यह श्रृदा भी कृतज्ञता हैं। मेरा मानना है कि कृतज्ञता से हम अपने आस पास के लोगो अैार परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील अैार सकारात्मक बन सकते है। इससे जीवन के प्रति नवीन दृष्टिकोण की उत्पत्ति होती है। कृतज्ञता से हमारे भीतर मावनीव गुणो का समावेश होता है। कृतज्ञता, वह गुण हैं जो हमारे भीतर किसी के द्रारा की गइ दयालुता को याद कराता हैं अैार हमसे उस अहसान को वापस करने का आग्रह करता हैं।

आगे जारी है......... 

 
 
 

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