top of page

Osho Awakens Our Conscience (Part - 5) (हिंदी अनुवाद- ओशो हमारे विवेक को जागृत करते है। भाग - 05)

  • Jun 26, 2025
  • 2 min read

Updated: Jun 30, 2025

दिनांक : 26.06.2025

सभी बंदरो ने हॉ, में अपनी गर्दने हिला दी। इस संकल्प के साथ सभा समाप्त हुई कि वे अब इंसान की नकल नही करेगें। टोपी वाला, उनकी तरफ टोपी उछालेगा तो हम उसकी टोपी लपक लेगे। अपनी टोपिया किसी भी हालत में नीचे नहीं फेकेंगें।

टोपीवाले के पुत्र ने पिता की आज्ञा की अनुपालना में गॉव-गॉव, ढाणी-ढाणी, टोपिया बेचना शुरु कर दिया। इस जगत में संयोग बहुत होते हैे। यह संयोग ही था कि उसका पुत्र भी उसी पेड के समीप से टो‍पियो का गटठर सिर पर उॅचे हुए गुजर रहा था। उसके मन में आया कि इस घनी छॉव वाले पेड के नीचे थोडा विश्राम करकें फिर आगे चलेगें। वह पेड के नीचे चादर बीछाकर लेट गया। थका हुआ था। कब नींद के आगोश में चला गया, उसे पता ही नहीं चला।

बंदरो का समूह टकटकी लगाए हुए देख रहा था।

जैसे ही उन्हे यकीन हो गया कि टोपीवाला गहरी नींद मे जा चुका है। तब सभी बंदरो की नजरे मिली। वे इस तरह से नीचे उतरे ताकि किसी तरह की आवाज नहीं हो। उन्होने टोपियों का गटठर खोला और सभी टोपिया सिर पर ओढकर पेड पर जा बैठे। सभी एक दूसरे की तरफ देखकर किलोलिया कर रहे थे।

इसी बीच टोपीवाले की ऑख खुल गई । उसने अपने गटठर को संभाला तो गटठर को नदारद पाया। वह बहुत बेचैन हुआ। फिर उसकी नजर पेड पर गई तो देखा कि पेड पर बैठे सभी बंदरो ने टोपियाॅ ओढ रखी हैं। वे उसे देखकर दॉत निकाल रहे है। वह मुस्कुराया। उसे याद आया कि उसके पिता ने समझाया था कि बंदंर नकलची होते है। इंसान जैसा करता है वैसा ही बंदर करते हैं। उसने अपनी टोपी सिर से उतारी और बंदरो की तरफ उछाल दी। संयोग से एक बंदर के सिर पर टोपी नही थी। उस बंदर ने वह टोपी भी लपककर अपने सिर पर ओढ ली और दॉत निकालकर टोपीवाले को चिढाने लगा। किसी भी बंदर ने जमीन पर अपनी टोपी नहीं फेंकी। सरदार क‍ि आज्ञा की पालना की l

टोपीवाला हैरान हुआ। उसका मुॅह लटक गया l

उसने हडबडाकर पत्थर फेंकने शुरु कर दिए। पत्थरो से बंदर डरे नही। पत्थर को अपनी तरफ आता देखकर शरीर को आगे पीछे, करके स्वंय को बचा लेते। उसने कई बार बंदरो को निशाना बनाकर पत्थर फेंके l लेकिन नतीजा ढॉक के तीन पात l जब वह पत्‍थर फेंकता फेंकता थक गया तो हार कर जमीन पर बैठ गया l

टोपीवाला निराश होकर, हाथ मलता हुआ, घर की ओर चल पडा। बंदरो की खुशी परवान चढ रही थी। पेड पर उत्सव जैसा महौल हो गया। उनका सरदार, अपनी अक्ल का लोहा मनवाने में कामयाब रहा।

    देखिए। ओशो की कल्पनाशीलता।

सदियो से चल रही, परंपरागत कहानी का अंत कैसे रुपांतरित कर दिया। 

आगे जारी है.............

 
 
 

4 Comments


Jubair Bhati
Jubair Bhati
Jun 26, 2025

A very insightful and beautifully translated piece. Osho’s thoughts, presented in such simple language, truly awaken the inner conscience and invite deep reflection. Thank you for sharing this inspiring post.

Like

Sameer Khan
Sameer Khan
Jun 26, 2025

💐💐💐

Like

Sameer Khan
Sameer Khan
Jun 26, 2025

👌👌👌

Like

irfannilofar5555
Jun 26, 2025

Prem humesha jhukta h or ahnkaar akad ke khda rhta h athwa prem ko chune

Like

About Me

WhatsApp Image 2025-..._imresizer.jpg

नमस्ते, मैं अय्यूब आनंद
आपका स्वागत करना मेरे लिए प्रसन्नता की बात है।

Osho the Great

Posts Archive

Keep Your Friends
Close & My Posts Closer.

"मुझे एक प्रार्थना भेजें,
और मैं आपको एक प्रार्थना वापस भेजूंगा।"

  • Twitter
  • Facebook
  • Instagram

Contact us

© 2035 by Ayub Khan Powered and secured by Wix

bottom of page