Osho Awakens Our Conscience (Part - 4) (हिंदी अनुवाद- ओशो हमारे विवेक को जागृत करते है। भाग - 04)
- Jun 21, 2025
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Updated: Jun 26, 2025
दिनांक : 21.06.2025

पाठयपुस्तको में यही पर कहानी का अंत हो जाता है। ओशो कहते है कि यह कहानी अधूरी है। ओशो इस अधूरी कहानी को इस तरह पूरी करते है-
टोपी विक्रेता, देर शाम तक अपने घर पहुॅचा। उसकी उम्र सत्तर वर्ष पार कर गई थी। उसने सॉझ का भोजन करते हुए अपने बडे पुत्र सहित आज घटित हुई, घटना का वृतांत अपने परिवारजनो को सुनाया और अपनी बुद्दि की खुद ही तारीफ करते हुए खुलासा किया कि किस तरह उसने बंदरो से टोपियो को पुनः हासिल किया। परिवारजन भी उसकी बुद्दि की तारीफो के पुल बॉधने लगे।
उसने गंभीर होकर अपने बडे पुत्र से कहा कि मै अब बुढा हो गया हूॅ। मुझमें, अब गॉव-गॉव, ढाणी-ढाणी टोपियों का गटठर लेकर घूमने की ताकत नही बची है। मै, अब गटठर उठा कर घूमते हुए थक कर चूर हो जाता हॅू। अब तुम बडे हो गए हो, इस खानदानी काम को चालू रखने का भार तुम्हारे कंघो पर हैं। मेरे कंघे अब थक गए हैं। बडे पुत्र ने हॉ, कर दी। फिर उसने अपने अनुभव बडे पुत्र के साथ साझा किए। उसने कहा कि तुम्हे कई गॉवो में जाकर टोपिया बेचनी है। इसलिए जाहिर हैं कि तुम्हे किसी वृक्ष के नीचे विश्राम भी करना पडे। यह भी संभव हैं कि तुम्हे विश्राम करते-करते नींद भी आ जाए। सोने से पहले टोपियो के गटठर को मजबूती से बांध देना। उसने अपने पुत्र को आज, उसके साथ घटित घटनाक्रम सेे अवगत कराते हुए कहा- ''मुझे मालूम था कि बंदर, इंसान की नकल करते है। मैनें अपने सिर से टोपी उतारी और बंदरो की तरफ उछाल दी। इसके जवाब में बंदरो ने भी अपने-अपने सिर से टोपिया उतारकर उछाल दी। मैने सभी टोपियों को गटठर में बॉधा और घर चला आया ।'’
दो क्षण ठहरकर उसने अपने पुत्र को समझाने वाले अंदाज में कहा -
'’ अगर तुम्हारे साथ भी ऐसी घटना, घटित हो जाए तो घबराना मत। अपने सिर से टोपी उतारकर बंदरो की तरफ उछाल देना। बंदर भी वैसा ही करेगें। ‘‘
पुत्र के बात समझ में आ गई।
वह बोला-
‘‘ ठीक है, पिताजी। मै कल से टोपियॉ बेचने का काम शुरु कर दूॅगा। वैसे तो मै विश्राम करने से पहले गटठर की गॉठ मजबूती से बॉध लूॅगा। फिर भी खुदा न खास्ता ऐसा वाकया हो गया तो मैं वही करुगॉ जो आज आपने किया।‘‘
उधर, रात को बंदरो ने भी एक सभा का आयोजन किया। वे टोपिया छिन जाने से दुखी थे। बंदरो का सरदार सुबह से ही दूसरे जंगल में गया हुआ था। अभी-अभी लौटा तो बंदरो ने आज का वाकया, अपने सरदार को सुनाया। वह नाराज हुआ और उसने विचार विमर्श हेतु बंदरो की सभा आयोजित कर ली। वह क्रोधित होकर बंदरो को संबोधित कर रहा था-
‘‘तुम लोगो में बुद्दि नाम की चीज है, या नही । जब परमात्मा बुद्दि का वितरण कर रहा था, तब तुम लोग शायद सो गए थे। बेवकूफो, मानव आज भी हमें नकलची समझता है। जबकि मानव हमारा ही विकसित रुप हैं। हमें इस धारणा को तोडना होगा कि इंसान की नकल करना हमारा स्वभाव हैं। ध्यान से सुनो, मूर्खो। अब कभी कोई टोपी बेचने वाला, इस पेड के नीचे सो जाए और तुम टोपिया लेकर नीम पर चढ जाओ तब टोपीवाला, अपनी टोपी उतारकर तुम्हारी तरफ उछाल दे तो तुम लोग अपनी टोपिया नही उछालोगे।‘‘
सरदार की बातो को सभी बंदर ध्यान-मग्न होकर सुन रहे थे। उनके चेहरो पर आत्मग्लानि के भाव, साफ-साफ दिखाई दे रहे थे। चारो तरफ सन्नाटा था। इस सन्नाटे पर तब चांटा पडा जब, एक बूढे बंदर ने हिम्मत करके पूछा -
‘‘तो सरदार हमे क्या करना चाहिए ?''
‘‘हमे, वह टोपी भी लपक लेनी चाहिए।‘‘ सरदार ने आदेश पारित किया।
सभी बंदरो ने हॉ, में अपनी गर्दने हिला दी। इस संकल्प के साथ सभा समाप्त हुई कि वे अब इंसान की नकल नही करेगें। टोपी वाला, उनकी तरफ टोपी उछालेगा तो हम उसकी टोपी लपक लेगे। अपनी टोपिया किसी भी हालत में नीचे नहीं फेकेंगें।
आगे जारी है



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Nice moment