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How did Osho come into my life? (Part-3) (हिंदी अनुवाद - मेरी, जिंदगी में कैसे आए, अेाशो : भाग-3)

  • Jun 2, 2025
  • 3 min read

Updated: Jun 4, 2025

दिनांक : 02.06.2025

चार दशको की अेाशोमय जीवन शैली से जो आनंद की अनुभूतिया हुई, उन्‍हे जगत को बाॅट रहा हॅू। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मै जिस अनुपात में इन सुखद अनुभूतियों को जगत के साथ साझा कर रहा हूॅ, उसके दुगुने अनुपात में आनंद के झरने स्वंमेव भीतर विकसित होते जा रहें हैं।

सदगुरु अेाशो ने परमात्मा की प्राप्ति अैार आनंददायक जीवन की अेार उन्मुख होने के लिए जिन ध्यान प्रयोगो की इजाद की हैं। यदि उनको होशपूर्वक निरन्तर किया जाए तो आनंद की झलके मिलना प्रारंभ हो जाता हैं। इन ध्यान प्रयोगो से मैंने जो कुछ पाया। वह आपके साथ शेयर करने में ही आनंद आ रहा हैं।


इन ध्यान प्रयोगो को आमजन की भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हॅू। इसका कारण यह हैं कि अेाशो जिन लोगो को ध्यान करवा रहे थे, वे लोग विश्व के सुसंस्कृत अैार अतिशिक्षित व्यक्ति थे। अेाशो की भाषा उन लोगो के लिए तो समझने योग्य थी। लेकि‍न सामान्यजन उस भाषा को समझने में कठिनाई महसूस करता हैं। अतः हमने बोलचाल की सामान्य भाषा का प्रयोग कर शांति की आकांक्षा रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए अेाशो की देशना को समझने के द्वार खोल दिए हैं।


किशोरावस्था में अेाशो को सुनने से उस समय यह बात समझ में आ गई थी कि बरसो मेहनत करने के बाद जिन लोगो ने प्रतिष्ठा अर्जित की थी। उनके जीवन से बैचेनी के तन्तु विसर्जित नहीं हुए है। बैचेनी, अब भी बरकरार हैं। जिस यश को हासिल करने के लिए एडी चोटी का जोर लगा दिया था। वह यश हासिल हो जानें पर तो जीवन में शांति की सरिता बहनी चाहिए थी। वह यश प्राप्त करने के बाद तो जीवन तृप्ति की खुशबू से महकना चाहिए था। यश प्राप्ति ही तो उनकी चाहत थी। अब चाहत तो पूरी हो गई लेकिन न तो बैचेनी के तन्तु मस्तिष्क से विदा हुए अैार ना ही जीवन में शांति की सरिता बहती हुई नजर आई। तृप्ति के फूलो की सुगंध तो दिखाइ नहीं दी बल्कि यश को कायम रखने की कवायद शुरु हो गई। इस कवायद में जीवन उलझकर रह गया। शांति और आनंद का ख्‍वाब हकीकत में तब्‍दील होता हुआ नजर नहीं आ रहा था l जो चाहा था वो मिल गया फिर भी सुकून अब भी कोसो दूर हैे l


जिसे पाने के लिए अपनी पूरी जीवन उर्जा खर्च कर दी थी। उर्जा खर्च करने से लक्ष्य मिल भी गया। लेकिन अब? यश तो मिल गया लेकिन बैचेनी का वजूद अब भी बरकरार हैं। दशको से बैचेनी नियति सी लगने लगी थी। इस नियति से ताल्लुकात ऐसे ही खत्म नहीं हो जाएगें। इस बैचेनी को दूर करने के लिए यश के अनुरुप बडा मकान तो होना ही चाहिए। अब बडा मकान बनाने में उर्जा खर्च होनी शुरु हो जाएगी। जैसे तैसे मकान भी बन गया। अब तो लगा कि बैचेनी खत्म हो ही जानी चाहिए। लेकिन बैचेनी है कि खत्म होनें का नाम ही नहीं ले रही। अब यह चिंता सताने लगी कि मोहल्‍ले में किसी ने मेरे मकान से बडा मकान बना लिया तो क्‍या होगा l


इस बैचेनी अैार बोरियत की संकल्पना तब समझ में आई, जब मैने अेाशो की '’एस धम्मो सनतनो'’ पढी। इस प्रवचनमाला में अेाशो ने कहा कि धनी तो बहुत लोग हो जाते हैं अैार धनी नहीं हो पाते। जब वे धनी या यशस्वी होते हैं तब बैचेनीपूर्ण जीवन जीने का अभ्यास इतना घना हो जाता हैं कि चैन ही पहचान ही गायब हो जाती हैं। सोचा तो यह होगा कि जब धन अैार यश को पा लेगें तब चैन से रहेगें। चैन से रहना इतना आसान नहीं हैं। धन व यश का जीवन में आगमन तो हो गया लेकिन बैचेनी वहीं की वहीं है।


जीवन के दुख, संताप, बैचेनी अैार पीडा के मूल कारण अेाशो ने ही समझाए हैं। गौतम बुद्द के वचन का उल्‍लेख करते हुए अेाशो ने कहा कि बुद्द मानते थे कि जीवन में दुख हैं। जब दुख हमें पकडता हैं तो हम पूछते हैं कि यह दुख किसने पैदा किया? मेरा दुख कौन पैदा कर रहा है? परिवारजन, सामाजिक व्यवस्था या आर्थिक ढॅाचा? अेाशो कहते है कि यह प्रश्न काल मार्क्स से पूछा जाता तो वे कहते कि समाज का आर्थिक ढॅाचा गलत हैं। फ्रायड से पूछते तो वे कहते कि मनुष्य को वृतियाे के मुताबिक उसे कार्य करने के लिए स्वतंत्र छोड दिया जाए तो वह जंगली जानवर जैसा निरंकुश हो जाएगा वह निरंकुश मानव, सभ्यता को नष्ट कर देगा। यदि मनुष्य को प्रशिक्षण देकर परिष्कृत करने का प्रयास किया जाए तो उसकी मूल प्रवृति दमित हो जाएगी। फ्रायड के अनुसार मूल प्रवृति के दमन से दुख पैदा होता हैं। मानव को स्वतंत्र छोड दो तो निरंकुशता पैदा हो जाएगी। उसकी मूल प्रवृतियो में परिवर्तन करने का प्रयास करो तो दमन हो जाएगा। दोनो ही तरीके फ्रायड ने उचित नहीं मानें।


आगे जारी है .............




 
 
 

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