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How did Osho come into my life? (Part-2) (हिंदी अनुवाद - मेरी, जिंदगी में कैसे आए, अेाशो : भाग-2)

  • May 31, 2025
  • 2 min read

Updated: Jun 2, 2025

दिनांक : 31.05.2025

चार दशक बाद आज भी मुझे याद है l ''अनहद में विसराम'' मे अेाशो कह रहे थे-

‘’ अैार, जिसने उस शून्य को पा लिया, उसने विश्राम को पा लिया ।

यह विश्राम ऐसा हैं जिसकी कोई हद नहीं। जिसकी कोई सीमा नहीं।'

मेरे ख्याल में आया कि एक कैसिट में मात्र नब्बे मिनिट का एक ही प्रवचन आता है। यदि पुस्तक मिल जाए तो विश्राम की पूरी थ्योरी समझ में आ जाए। उस एक प्रवचन को सुनने के बाद मस्तिष्क में कई प्रश्न पैदा हो गए थे। इन प्रश्नो के उत्तर, पुस्तक में ही मिल सकते थे। कुछ प्रयास करने के बाद यह पुस्तक मेरे गाॅव के सार्वजनिक पुस्तकालय में मिल गई। मुझे ऐसा लगा जैसे कबीरदास जी सही कहते हैं कि ''जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी बैठ''

इस प्यारी पुस्तक में अेाशो कहते है-

‘’मैं, अपने सन्यासियों को न तो हिंदू मानता हूॅ, न मुसलमान, न जैन, न बौद्द। मेरा सन्यासी तो शून्य की खोज कर रहा हैं। सारी दीवारे गिरा रहा है। मेरा सन्यासी तो अनहद की तलाश में लगा हैं। सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा हैं। घर नहीं छोडना हैं। घर में रहते ही जानना हैं कि घर मेरी सीमा नहीं हैं। परिवार को भी छोडना नहीं हैं। परिवार में रहते हुए ही जानना हैं, कि परिवार मेरी सीमा नहीं हैं। इस बोध को ध्यान कहो। विवेक कहो। जो भी शब्द तुम्हे प्रीतिकर लगे, वह कहो। शून्य में पहॅुचने पर ही तुम्हे विश्राम मिलेगा। वरना जीवन एक संताप है। पीडा है। दुख है। बिना शून्य में प्रवेश करे, हमारी जडे सूखी जा रही हैं। पौधे झुलस रहे हैं। जैसे ही किसी ने शून्य में अपनी जडे जमा ली तभी हरियाली छा जाती हैं। फूल उग आते हैं। बसंत आ जाता हैं। जीवन में बहार आ जाती हैं। भंवरे गीत गाने लगते हैं। मधुमक्खिया गूंजार करने लगती हैं। तब जानना की अब जीवन कृतार्थ हो गया।'’

अेाशो के उपरोक्त प्रवचनांश को पढने के बाद ऐसा महसूस हुआ कि मुझे कई प्रश्नो के उत्तर मिल गए है। मेरी समझ में आया कि हमारा जीवन निरसता अैार बोरियत जैसे रोगो से ग्रसित क्यो हैं? क्‍यों द‍िमाग चौबिस घंटे विचारो के झंझावत में उलझा रहता है। एक विचार दिमाग से गया नही कि दस नए विचारो ने पता नहीं कहॅा से आकर हमला बोल दिया। मुझे ऐसे लोग भी मिलते थे जिनके पास पद था। प्रतिष्ठा थी। समाज में यश था। इसके बावजूद उनसे बात करते ही अहसास हो जाता था कि वे बैचेन हैं। अशांत हैं। उनकी बैचेनी अैार अशांति को देखकर उनके प्रति करुणा उत्पन्न होती कि यह लोग अेाशो को सुनना शुरु क्‍यों नहीं कर रहे हैं। अेाशो की "अनहद में विसराम" पुस्तक पढने के बाद इस नतीजे पर पहुॅचा कि यह लोग परमात्मा के इस खूबसूरत अैार आनंददायक जगत के साथ स्वंय को समायोजित नहीं कर पा रहे हैं।

अगले ब्लॉग में जारी है ..........


 
 
 

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