What Are Emotions Called? (Part - 03) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 03)
- Jul 24, 2025
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दिनांक : 24.07.2025

आगंतुक खुश हुआ। उसने मन ही मन सोचा कि उसका चुनाव अच्छा रहा। इस प्रकार जिसकी, जैसी सोच, वैसे ही उसके भाव। कबीरदास भी कहते है--मै बुरे व्यक्ति की खोज में निकला था लेकिन मुझे कोई बुरा आदमी ही नहीं मिला। जब मैने मेरे भीतर झॉककर देखा तो पता लगा कि मुझसे बुरा तो कोई नहीं हैं।
समाज, परिवार और परवरिश मिलकर भावो को शुद्द या अशुद्द करने का काम करते है। भाव, जीवन की दशा और दिशा के निर्धारक है। जो भाव, समाज की गला काट प्रतियोगिता के कदमेा तले कुचलकर अशुद्द हो चुके है। उन्हे शुद्द किया जा सकता है। ओशो ने साठ साल पहले महाबलेश्वर के प्रकृतिक वातावरण में एक घ्यान शिविर आयोजित किया था। इस शिविर में सदगुरु ओशो नें भावो को शुद्द करने के उपाय भी सुझाए हैं। जिन लोगो नें इन उपायो को इमानदारी और लगन के साथ आजमाया, उन लोगो के अनुभव शानदार रहें। सर्वप्रथम आघ्यात्म की दृष्टि से भावो पर विचार करते है फिर ओशो के द्वारा सुझाए गए ,घ्यान प्रयोगो का विवेचन करेगें।
ओशो ने भावनाओ को मानव जीवन में उच्च स्थान दिया है। भाव शुद्दि की उपयोगिता, शरीर शुद्दि और विचार शुद्दि से अधिक मानी गई है। मानव अपने भावो से सर्वाधिक प्रभावित होता हैं। प्रेम, घृणा और क्रोध भावो से प्रभावित होते हैं। ओशो कहते हैं कि अधिकांश व्यक्तियो को मालूम है कि क्रोध से खराब कोई स्थिति नहीं है। ज्यादातर अपराध क्रोध की देन होते है। लोग संकल्प भी करते है कि अब वे क्रोध नहीं करेगें लेकिन जब क्रोध उन्हें पकडता है तो सारे संकल्प धरे रह जाते है। ऐसा क्यो होता है कि जब हम विचार के तल पर क्रोध नहीं करने का प्रण कर लेते है फिर भी उस संकल्प को जीवन में प्रयुक्त नहीं कर पाते हैं। संकल्प को जिंदगी के सफर में हमराह बनाना होगा। फिर सफर प्रतिकर हो सकेगा। फिर यक्ष प्रश्न खडा होता हैं कि क्या, भाव और विचार जीवन को कैसे रुपांतरित कर सकते हैे? अेाशो के अनुसार, जीवन तब रुपांतरित हो सकता हैं जब भाव शुद्द हो जाए। लेकिन भाव शुद्दि के लिए भी साधना आवश्यक हैं। ऐसा नहीं हैं कि हमने मन को निर्देशित किया कि भाव शुद्द हो जाअेा। और भाव शुद्द हो गए। सामाजिक परिवेश ने भावो को अशुदद करने में कोई कसर नहीं छोडी है।
भाव कब अशुद्द होते है? ओशो के अनुसार भाव, तब अशुद्द होते है, जब मैत्री, घृणा में, करुणा क्रूरता में, प्रफुल्लता संताप में और कृतज्ञता अकृतज्ञता में परिवर्तित हो जाए। इसलिए भावो की शुद्दि हेतु साघना करनी होगी। ओशो ने इस साधना के लिए चार भाव सुझाए हैं- मैत्री, करुणा, प्रफुल्लता और कृतज्ञता।
सर्वप्रथम मैत्री पर विचार करते है। ओशो ने मैत्री को मित्रता के समकक्ष न मानकर इसे उच्च स्थान दिया हैं। अर्थात, मैत्री, मित्रता की सुपरलेटिव डिग्री हैं। मैत्री की गहराई में जाते हुए ओशेा ने कहा कि हमें वस्तुओ और चीजो के रुप में ही बाहरी जगत ही नजर आता है। भीतरी जगत, संवेदनाओ से मनुष्य को घेरे हुए हैं। इसके लिए हमे संपूर्ण जगत के प्रति अपने भीतर मैत्री का भाव उत्पन्न करना होगा। हमें अपने चित्त में यह बात बैठानी होगी कि मेरा किसी भी व्यक्ति, पशु, पक्षी, पेड पौधो से वैर नहीं है। मेरी संपूर्ण जगत के प्रति मैत्री हैं। हमारे चित्त में जितनी घृणा और ईर्ष्या की भावना होगी, उतना ही हमारा चित्त अंशात और उद्दीग्न होगा। चित्त की शांति के लिए मैत्री की साधना प्रथम सौपान है। मैत्री की साधना इतनी सरल है कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसी सरल साधना से मनुष्य हजारो सालो से वचिंत रहा। ओशो ने प्रथम बार भाव शुद्दि का प्रथम द्वार मैत्री को घोषित कर मानव के चित्त को अंशाति के भंवर से निकालने का प्रयास कियां।
आगे जारी है.........
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