Osho Awakens Our Conscience (Part - 3) (हिंदी अनुवाद- ओशो हमारे विवेक को जागृत करते है। भाग - 03)
- Jun 17, 2025
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Updated: Jun 21, 2025
दिनांक : 17.06.2025

यह अनुभव में आया कि हमारे आस-पास जो घटित हो रहा है। वह नैसर्गिक नही है। हमने प्रकृति के साथ इतनी छेडछाड करी है कि प्रकृति का मूल स्वरुप ही नष्ट हो गया है। क्या सदियो से स्कूलो के पाठयक्रम मे चल रही कहानियां अधूरी हो सकती है। इसका आभास भी ओशो की वजह से हुआ।
स्मृति के आधार पर पाठयपुस्तक की वह कहानी लिख रहा हूॅ। विचार करे कि पहली बार ओशो की प्रज्ञा से वह कहानी अपने वास्तविक अंत को प्राप्त हुई। मैंने तीन दशक पहले इसे एक प्रवचन में सुना था। ओशो कह रहे थे कि बंदरो के बारे में प्रचलित है कि वे नकलची होते है। यदि मानव उन्हे डराने की कोशिश करता है तो वे अपने दॉत भींचकर आक्रामक मुद्रा बनाकर हिंसक नजर आने लगते हैं। कोई प्रेम से उनकी तरफ केला उछालता है तो वे विकिटकीपर की भांति उसे लपक लेते है। उस समय उनकी मुद्रा, धन्यवाद की होती हैं। जब वे प्रेमालाप कर रहे हो तब उन्हे डिस्टर्ब किया जाए तो उनकी मुख मुद्रा अलग प्रकार की हो जाती है।
एक टोपिया बेचने वाला था। गॉव-गॉव, ढॉणी-ढाणी, मे फेरी लगाकर अपनी टोपिया बेचा करता था। यह उसका खानदानी व्यवसाय था। उसकी चार पीढियॉ यही कार्य करती रही थी। टोपियॉ, सिलने का कार्य महिलाऍ करती थी और उन्हे बेचने का कार्य परिवार के पुरुष करते थे। टोपिया बेचने से जो आमदनी होती थी, उससे परिवार की आजीविका चलती थी।
एक दिन वह समीप के गॉव में टोपियॉ बेचने गया हुआ था। टोपियों का गटठर, उसके सिर पर था। गर्मियो के दिन थे। दोपहर हो चली थी। काफी थक गया था। फिर उसे नीम का छायादार वृक्ष नजर आया। वह वृक्ष के नीचे पहुचाॅ तो उसे कुछ शीतलता महसूस हुई । उसने टोपियों का गटठर जमीन पर रखा । बोतल से पानी पिया और बोरी बिछााकर लेट गया। गर्मियो में सूरज आग उगल रहा था। वह बीस किलोमीटर का सफर कर चुका था। थकान के कारण, नींद की परिया, उस पर जादू डालने लगी। वह नींद के आगोश में चला गया। बहुत गहरी नींद आई। करीब दो घंटे की गहरी नींद लेकर वह जागा तो उसे टोपियों का गटठर नजर नही आया। उसके चेहरे पर चिंता की लकीरे साफ नजर आने लगी। उसने दूर-दूर तक नजर दौडाई लेकिन टोपियों का गटठर कहीं, नजर नहीं आया। उसका गला सूख गया। वह बैचेन हो गया।
उसने नीम के पेड की शाखाओ पर देखा तो पूरा माजरा समझ में आ गया। पेड पर बंदरो की बारात रुकी हुई थी। पेड पर लगभग साठ-सत्तर की तादाद में बंदर होगें। प्रत्येक वानर के सिर पर टोपी थी। वे टोपी सहित एक शाखा से दूसरी शाखा पर उछल-कूद कर रहे थे। उसने बंदरो को इतना खुश कभी नही देखा था। उसने कई बार सडक के किनारे बैठे बंदरो को केले खिलाए थे। केले खाते वक्त भी बंदर इतने खुश नही हुए थे। टोपी उनका खादय पदार्थ भी नही थी। फिर भी वे बहुत खुश थे।
दिमाग पर जोर डाला तो उसके चेहरे से चिंता की लकीरे मिटने लगी।
उन लकीरों का स्थान लिया एक मुस्कान ने।
वह मुस्कुराया।
उसने अपने पूर्वजो से सुना था कि बंदर नकलची होते है। वे आदमी की नकल करते है। उसके सिर पर भी एक टोपी थी। यह मानते हुए कि जैसा एक्शन, मै करुगॉ वैसा ही एक्शन नीम पर बैठी बंदरो की बारात करेगी, उसने अपने सिर से टोपी उतारी और बंदरो की तरफ उछाल दी। बंदरो ने भी, वैसा ही किया। उन्हाने भी अपनी टोपिया, टोपी विक्रेता की तरफ उछाल दी। बंदरो की टोपिया जमीन पर गिर गई। टोपी विक्रेता खुशी से झूम उठा। उसने जमीन पर गिरी, टोपियों को इकटठा किया और उन्हें, अपनी गठरी में बॉध लिया। उसने एक नजर नकलची बंदरो पर डाली। फिर टोपियों से भरी गठरी को सिर पर रखकर अपने घर के लिए रवाना हो गया। बंदर मुॅह ताकते रह गये। उसने अपनी बुद्दि का लोहा मनवाने वाले अंदाज में धीमे से कहा ‘‘बेचारे बंदर‘‘।
आगे जारी है .. ......



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