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Osho Awakens Our Conscience (Part - 2) (हिंदी अनुवाद- ओशो हमारे विवेक को जागृत करते है। भाग - 02)

  • Jun 12, 2025
  • 3 min read

Updated: Jun 17, 2025

दिनांक : 12.06.2025

जीवन के रुपांतरण के मार्ग पर ऐसा अवरोघ पैदा कर दिया गया कि कोई इन अवरोघको को पार नही कर सके।

लोगो को पूर्व जन्म के संस्कारो के जाल में इस तरह उलझा दिया गया कि वे यह सोचकर संतुष्ट हो जाए कि जब पूर्व जन्म के संस्कारो से ही हमारा वर्तमान निर्मित हुआ है तो हम कुछ नही कर सकते। आज हमारे जीवन में दुख ने पॉव पसार रखे है तो दुखो को अलविदा कहने का हमारे पास कोई चारा नही है। हमें यह दुख तो भोगने ही होगें। जब इस प्रकार की अवघारणा से कोई समाज ग्रस्त हो जाए तो समझ लीजिए कि इस कृत्रिम दुख के जाल से बाहर निकलने के दरवाजे बंद हो चुके है। इस अवधारणा ने मानव के दुख के कारागृह से बाहर निकलने के उपाय तथा सोचने समझने की शक्ति छीन ली गई। 

जब आशो ने लोगो को जागृत करना शुरु किया तो ऐसी अवधारणा के प्रतिपादक तिललिाने लगे। उन्होने ओशो को बदनाम करने के उपाय खोजने शुरु कर दिए। सबसे पहले तो उन्हे नास्तिक घोषित किया गया। समाचार पत्रो मे उनके बारे में लिखा जाने लगा कि वे घर्म विरोधी है। वे लोगो को शास्त्रो के विरुद् आचरण करने हेतु दुष्प्रेरित कर रहे है। मुझे याद है, जब मैने ओशो को पढना शुरु किया था, तब मोहल्ले के लोगो ने मेरा अघोषित बहिष्कार सा कर दिया था। जैसे ही मुझे ओशो की पुस्तक पढते देखते तो बुरा सा मुॅह बनाकर हिकारत की दृष्टि से देखते ताकि मैं अपराघ बोघ ग्रसित होकर ओशो को पढना छोड दूॅ।

ओशो को पढने से धीरे-घीरे, मेरा विवेक जागृत होने लगा। मै प्रत्येक कार्य आरंभ करने से पूर्व उसकी औचित्यता और तार्किता पर विचार करने लगा। ‘‘क्यो और कैसे‘‘ जैसे शब्द, हर वक्त मेरे दिलो दिमाग मे छाए रहते थे। मै पत्रिकाओं में कोई कहानी भी पढता तो सबसे पहले कहानीकार की मानसिकता का विश्लेषण करने लग जाता । फिर उस कहानी के अंत को लेकर विचार करता कि क्या कहानी का इस तरह अंत करना औचित्यपूर्ण था,? क्या इसमे एक घटना और जोडी जा सकती थी? यदि मुझे लगता कि एक और घटना का समावेश करने से कहानी की रोचकता में वृदि हो सकती है तो मैं अपनी नोटबुक में कहानी का विस्तार करके एक घटना और जोड देता। चुनिंदा मित्रो को, जोडे गऐ कथानक को सुनाता तो वे पहला प्रश्न यही पूछते कि मै प्रत्येक चीज में अपनी टॉग क्यो अडाता हूॅ।    

   वे यह तो मानते थे कि मै कहानियो को मात्र मनोरजन के लिए नही पढता हूॅ बल्कि कहानियो को गंभीरतापूर्वक पढकर अपने विवेक का भी प्रयोग करता हूॅ। कभी-कभी तो मै अध्यापको को भी पाठयपुस्तको की कहानियों में कथानक जोड कर सुनाता तो वे आनंदित होते और कक्षा में नए कथानक का मुझसे वाचन भी करवाते। कई शिक्षको को पसंद नही आता और वे मेरे द्वारा जोडे गए कथानक की खिल्ली भी उडाते थे।

कहानियो के प्रति विवेक को जागृत करने का श्रेय ओशो को ही जाता है। ओशो की किसी पुस्तक में, मैने एक कहानी पढी और कहानियों में जोडने घटाने की प्रवृति विकसित हुई। वैसे तो पूरा जीवन ही ओशो के विचारो से प्रभावित हुआ है। मुर्छा के घने बादलो में से होश की कुछ किरणे दृष्टिगत होने लगी। रचनात्मकता की वीणा से कुछ सुर सुनाई देने लगे। जीवन को अपने ढंग से जीने का बीज अंकुरित होने लगा। सामाजिक परिवेश से जो अपुष्ट श्रृद्दा का पाठ पढा था, वो अब संदेह के घेरे में आने लगा।

यह अनुभव में आया कि हमारे आस-पास जो घटित हो रहा है। वह नैसर्गिक नही है। हमने प्रकृति के साथ इतनी छेडछाड करी है कि प्रकृति का मूल स्वरुप ही नष्ट हो गया है। क्या सदियो से स्कूलो के पाठयक्रम मे चल रही कहानियां अधूरी हो सकती है। इसका आभास भी ओशो की वजह से हुआ।

आगे जारी है ........ ..

 
 
 

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