विचारो के कैसे पाक-साफ करे? भाग-1
- May 10
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Updated: May 17
दिनांक : 10.05.2026
अध्याय : 04 (विचारो के कैसे पाक-साफ करे?)

अब हम विचार शुद्दि पर चर्चा करते है। भाव-शुद्दि की चर्चा करते हुए हमने कहा था कि जो भाव दूसरो के कृत्यों की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होते है। वे भाव अशुद्द होते हैं। विचारो और भावो में समानताए है। इनके मध्य बारीक अंतर भी हैं। लगभग प्रत्येक मनुष्य के दिमाग में हर समय विचारो का रैला चलता रहता है। यह रैला जागृत अवस्था में तो चलता ही है परंतु नींद में भी यह रैला, हमारा पीछा नहीं छोडता है। हम औफिस में बैठे काम कर रहे है और हमारा ध्यान क्रिकेट मैच में लगा हुआ है। हम भोजन कर रहे होते है और हमारा ध्यान खेतो-खलियानो में भटकता रहता है। कई बार तो दिमाग में ऐसे विचार आते है, जिसे हम किसी निकट संबंधी को भी नहीं बता सकते है। विचारो के घने बादल दिमाग मे तैरते रहते है। एक विचार आता है, उसे हम पूरा समझ ही नहीं पाते हैं कि दो दूसरे विचार आकर पहले वाले विचारो का स्थान गृहण कर लेते हैं। विचारो के कोलाहल से चिंता और विषाद उत्पन्न होता है। जीवन में नकारात्मकता अपने पैर पसारने लगती हैं।
इन विचारो से मुक्ति पाने के उपाय भी ओशो ने बताए है। उनका कहना हैं कि भावो की भॉति विचारो का भी शुद्दिकरण किया जा सकता है। यह शुद्दिकरण मात्र संकंल्प करने से नही होगा बल्कि इसके लिए निरंतर अभ्यास किया जाना अपेक्षित हैं। मनोवैज्ञानिको ने भी ओशो द्वारा प्रतिपादित विचार शुद्दि की प्रक्रिया को पूर्णत सही माना है। जो विधियॉ ओशो ने साठ साल पहले इजाद की थी। उन विधियो पर दुनियाभर के वैज्ञानिको ने बरसो शोध किया और उन विधियो पर सत्य होने की मुहर लगा दी हैं। अर्थात, ओशो द्वारा बताई गई विधिया अन्तराष्टीय स्तर पर स्वीकार की जाकर प्रयुक्त होने लग गई है।
ओशो से सन्यस्त उनके छोटे भाई स्वामी शेलेन्द्र जी ने कहा कि जिस प्रकार विष अपना प्रभाव शरीर पर डालता है उसी प्रकार सत्यम, शिवम और सुंदरम के भाव मस्तिष्क व ह्रदय को प्रभावित करते है। वे एक उदाहरण देते हैं कि यदि हम किसी होटल में भोजन करने जाए और हमें वहॉ मक्खिया और कोकरुज दिचााई दे तो हम वहॉ भोजन करना पसंद नहीं करेंगें। हमें फुड पोइजनिंग का भय सताने लग जाएगा। उन्होने विचारो को भी भोजन के समकक्ष माना है। जो वस्तु बाहर से भीतर जाती है, वह आहार है। भोजन भी बाहर से भीतर जा रहा है। विचार और सूचनाए भी बाहर से भीतर जाती है। अतः वे भी आहार के समकक्ष हैं। विचारो की गृहणता से पहले चुनाव करना चाहिए कि यह विचार गृहण किए जाने योग्य है या नही?
शेलेंद्र जी के अनुसार दुनियॅा में घटित हो रहे अपराधो और षडयंत्रो को सुनना और पढना अनावश्यक हैं। हमें अपराधी बनना नही है। हमें षडयंत्र करना नही है क्योकि यह सभी मार्ग दुख की मंजिल पर पहॅुच कर समाप्त होते हैं। राजनीति पर भी हद से ज्यादा सूचनाए एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं हैं। हमें राजनति में जाना नहीं और राजनैतिज्ञ हमारी सलाह मानने वाले भी नहीं है। फिर क्यों इन सूचनाओं और घटनाओ केा दिमाग में प्रविष्ट कराए। क्या औचित्य है?
जारी है ...................




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