ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र (भाग-4)
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दिनांक : 26.07.2026

फिर भी लोक-लाज और परिवार की प्रतिष्ठा की खातिर उस रिश्ते को ढोते चले जाते हैं। एक ही छत के नीचे बेगानो की तरह जिदंगी की गाडी को खींचते चले जाते है। क्या सार है? ऐसे रिश्तो में। अगर दोनो पक्षो और परिवारो के मूल स्वभाव को नजरअंदाज नहीं किया होता तो जीवन नारकीय होनें से बच सकता था। ऐसे हालातो में जीवन से आनंद का तो नामोनिशान ही मिट जाता है।
मेरे विचार में जो कृत्य, आनंद मार्ग की ओर ले जाता हो तो वह कृत्य धा्र्मिक है। वह कृत्य जीवन को पूर्णता प्रदान करेगा। जो रिश्ता या कृत्य, समाज में स्वंय को श्रेष्ठ और संपंन प्रमाणित करने के मकसद से किया जाता है, वह जीवन आंनद के बीजो को अंकुरित होने से रोक देगा। आनंद के स्थान पर थकान, विषाद, चिडचिडापन और बोझिलता घनी हो जाएगी।
अपने स्वभाव के प्रतिकूल कार्य करना दुख का मूल कारण है। ओशो कहते हैं कि बच्चो पर थोपे गए आदर्शो ने उन्हे जटिल और पाखडी बना दिया है। पाखंडीपन, व्यक्ति के मूल स्वभाव के प्रतिकूल हैं। मॅाता-पिता बच्चो को सिखा रहे है कि तुम्हे बनना है- आइंस्टीन जैसा। कोई बालक कानून की पढाई कर रहा है तो उसे निर्देशित किया जाता है कि वह रामलेठमलानी जैसा बन जाए। आज तक मैनें किसी परिजन से बच्चो को यह कहते हुए नहीं सुना कि तुम वह हो जाओ, जो तुम होना चाहते हो। ओशो चेतावनी देते है कि तुम इन महान हस्तियो की तरह होने के प्रयास में अपनी निजता खो दोगें। यह महान हस्तिया वास्तव में मानवता को विकसित करके गई हैं लेकिन उनकी अपनी निजता थी, उनका अपना स्वभाव था। हम उनके जैसे नही हो सकते।
परमात्मा, प्रत्येक जीव में उसकी अपनी निजता और स्वभाव के तत्वो का समावेश करके पैदा करता हैं। यदि हमने इन नामचीन हस्तियों का अनुसरण किया या उनके जैसे होने का प्रयास किया तो दुख के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होगा। हम अपनी पहचान और स्वभाव को भूल जाएगें। हमारा स्वभाव तो चित्रकार बनने का था और बन गए चिकित्सक । चिकित्सक भी परिजनो के दबाव से बने। अब चित्रकार और चिकित्सक के मध्य एक गतिरोध पैदा हो गया। न तो पूर्ण चिकित्सक बने और न ही चि़त्रकारिता विकसित हो पाई। अब स्थिति घोडे की न होकर खच्चर की हो गई।
ओशो ने रहस्य से पर्दा उठाते हुए कहा कि स्वभाव तो प्रकृति को कैनवास पर उकेरने का है, और कर रहे है रोगियो का इलाज। इससे जीवन खण्ढ-खण्ड हो गया। खण्ड-खण्ड जीवन तथा आनंद, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के समान हैं। इससे जीवन असहज होकर कुठिंत हो जाता है। ओशो ने सुझाव दिया कि तुम जैसे हो वैसे ही बनकर जीवो। तब जीवन सहज, सरल और आनंददायक होगा।
ओशेा की यह सलाह बहुमूल्य हैं कि तुम जैसे हो स्वंय को वैसा ही जगत के सामने प्रकट कर दो। इससे नकली मुखौटे लगाने की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। संभवतया, ऐसी सलाह किसी भी संत ने नही दी होगी। यह सलाह मनुष्य को ओशो की अमूल्य देन हैं। लोग कुछ भी कहे। इसकी फिक्र करने का कोई औचित्य नहीं है। परमात्मा ने जैसा बनाया है, वैसा ही प्रकटीकरण जीवन को सहजता और सरलता की ओर गतिमान कर सकता है। सहजता और सरलता में ही छिपा है, आनंद का रहस्य।
ओशो तो यहॅा तक कहते हैं कि तुम अपने आप को लोगो के सामने उघाड दो। कह दो लोगो से कि मेरा मूल स्वभाव तो यही हैं। यह मूल स्वभाव मुझे परमात्मा ने दिया हैं। अच्छा है तो ठीक। बुरा है तो ठीक हैं। मैने इसमें न तो कुछ जोडा है और न ही कुछ घटाया हैं। यह तथ्य बलहीन हैं कि लोग उसकी उदघोषणा को किस कसैाटी पर कसते है। ओशो पुनः चेतावनी देते हैं कि यदि हमने यह अपेक्षा की कि लोग हमे स्वीकृति प्रदान कर देंगे तो समझ लो कि भूल हो गई। लोगो की स्वीकृति न मिलने पर फिर दुख व संताप के बादल घिरने लगेगे और हम भयभीत होकर पुनः वैसे बनने की कोशिश करने लग जाएगें, जैसे कि लोग चाहते हैं। फिर मुखोटा पहनना पडेगा। फिर लोगो की अपेक्षाओ के अनुरुप होने की चेष्टा आरंभ होगी। यह मुखोटा प्रदर्शित करेगा कि हम अपने स्वभाव के प्रतिकूल होनें जा रहे हैं। जैसे ही जीवन का वाहन स्वभाव के प्रतिकूल राजमार्ग पर चलने लगता है तब असहता और अतृप्ति का तीव्रता से प्रवेश हो जाता है। यह असहजता जीवन को जीवन नही रहने देगी। जीवन को अभिनेताओ के रंगमंच में तब्दील कर देगी। इस रंगमंच पर सब कुछ अभिनय होगा। मुखोटे के आवरण में बनावटीपन के सिवाय कुछ भी नहीं होगा। यह बनावटीपन घातक हैं।
जारी है ...................
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