top of page

भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 26

  • 5 days ago
  • 4 min read

दिनांक : 03.05.2026

हमारे धन्यवाद के भाव की जागृति से ब्रहमाण्ड की उर्जा भी सहयोग प्रदान करने लगती हैं। जब सुबह नींद खुले तो हम कहे धन्यवाद। द सीक्रेट के सुधि पाठक ऐसे प्रयोग करते है। उन्हे चाहे कैसा भी भोजन दे दो वे परमात्मा को धन्यवाद देना नहीं भूलते हैं। कृतज्ञता ने कई व्यक्तियो के जीवन को रुपानंरित किया है। अभ्यास और यकीन का मामला है। आप कृतज्ञता के पौधे को सींचकर तो देखे । यह पौधा ही अपनी शीतल छाॅव तले भावो के शुद्विकरण में आपका मार्गदर्शन करता रहेगा।

बौद्द धर्म में कृतज्ञता का दायरा ‘‘धन्यवाद‘‘ कहने तक सीमित नहीं है। जीवन के परस्पर संबंधो की गहरी समझ से प्रशंसा के भाव का प्रादुर्भाव होता हैं। बौद्द धर्मावलंबी मानते हैं कि प्रति क्षण, प्रत्येक अनुभव और जीवन के सफर में मिलने वाले व्यक्ति, इस अस्तित्व का अंग हैं। इस परस्पर संबंध को स्वीकार करने से जीवन तो सरल होता ही है और कृतज्ञता का भाव गहन होता चला जाता हैं। बौद्द धर्म में कृतज्ञता के अभ्यास में दूसरो द्वारा हमारे प्रति की जाने वाली दयालुता को भी समाहित किया गया है। बौद्द शिक्षाए स्मरण कराती हैं कि हमारे पास जो कुछ भी हैं उसमें दूसरो की दयालुता एवंम उनके प्रयास का भी योगदान हैं। दूसरो की उदारत एवंम प्रयास प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हो सकते हैं। यह अहसास व्यक्तिगत लाभ की परिधि से निकलकर प्रशंसा के भाव को गहन करता है। इस भाव से परस्पर निर्भरता की महत्ता समझ में आने लगती हैं। बौद्द कहते है कि सभी प्राणियों को परस्पर जुडे रहना चाहिए। इनके धर्म गुरु सभी प्राणियों, पारिवारिक सदस्यो को पारस्परिक कृतज्ञता का पाठ पढाते हैं। बैाद्द शिक्षाअेा में तो यहॉ तक कहा गया हैं कि अपने विरोधियो के प्रति दयालुता और परस्पर करुणा के भाव से जीवन में आनंद के झरने बहने लगते हैं। उनका मानना हैं कि जब हम पारस्परिक दयालुता और जुडाव पर गहन चिंतन करते हैं तो स्वाभाविक रुप से हमारे ह्रदय में कृतज्ञता के फूल खिलने लगते हैं। सारांश के रुप में यह कहा जा सकता हैं कि धन्यवाद ज्ञापित करना भावो को शुद्द करने का सबसे सरल उपाय है। दयालुता और उदारता से जीवन में शांति और आनंद के मेघ अमृत वर्षा करने को आतुर हो जाते हैं।

बौद्व कृतज्ञता को प्रकट करने के लिए तरीके अपनाते है। वे भोजन करने से पूर्व भोजन के प्रति एकाग्रचित होने का प्रयास करते है। अपनी, आती-जाती सॉसों के प्रति सजग होने लग जाते है। वे श्वांस के आगमन अैार प्रस्थान को महसूस करके खुश होने लगते है। वे आती हुई श्वाॅस की शीतलता के अनुभव करते है। वे बाहर निकलती हुइ श्वॅास की गर्मी को भी नजरअंदाज नहीं करते हैं।

भोजन करने के कुछ समय पूर्व वे श्वॅासो के साक्षी बनकर उसे अनुभव करने की प्रक्रिया आरंभ करते है। फिर वे सभी प्राणियों की पारस्परित निर्भरता पर चिंतन करते हैं। चूॅकि अब भोजन करना प्रारंभ कर रहे है इसलिए उन परिस्थितियों को धन्यवाद ज्ञापित करते है जिन परिस्थितियों के कारण वे सुकून से भोजन कर पा रहे हैं। बौद्द भिक्षु, वर्तमान में जीना पसंद करते है इसलिए वे वर्तमान क्षण को बहुत पवित्र मानते हैं। धन्यवाद ज्ञापित करते समय, वे स्वयं को वर्तमान क्षण में डुबोने का प्रयास करते है। भोजन के प्रत्येक निवाले पर पर ध्यान केंद्रित करते हुए, उसे परमात्मा के प्रसाद की भॉति धन्यवाद के भाव के साथ गृहण करते हैं। जिस दिन धन्यवाद-दिवस मनाया जाता हैं, उस दिन लोगो को वस्तुओ के दान के अलावा समय का दान देने का भी प्रयास करते हैं। उस दिन वें सभी प्राणियों के प्रति प्रेम तथा दया का भाव को विकसित करते हैं। वे दूसरे के जीवन के साथ कृतज्ञतापूर्ण ठंग से स्वयं को उनके साथ जोडने का प्रयास करते है।

जैन समाज में कृतज्ञता को लेकर एक कहानी कई बार कही और सुनी जाती है। दो भाई थे-जिनेश और दिनेश। एक भाई भूतल पर तो दूसरा भाई प्रथम तल पर पत्नी और बच्चो के साथ निवास करता था । माता-पिता जीवित थे। वे कभी जिनेश के साथ तो कभी दिनेश के साथ भोजन कर लिया करते थे। एक दिन पिता का देहांत हो गया और मॉ अकेली रह गई। छोटे भाई के बच्चे अभी छोटे थे। इसलिए मॉ, ज्यादातर भूतल पर निवास करने वाले अपने छोटे पुत्र के पास ही रहने लगी। दोनो भाईयो ने विचार किया कि मॉ के हाथ में कुछ पैसा होना चाहिए ताकि वह कुछ लेना चाहे या किसी को देना चाहे तो उसे मुैह न ताकना पडे। अतः दोनो भईयो ने माता को दो-दो हजार रुपए मासिक देना तय किया। फिर वे मासिक खर्चे का भुगतान करनें लगे।

एक दिन बडे भाई को लेटे-लेटे विचार आया कि जिस मॉ ने उनकी सभी ईच्छाओं की पूर्ति में ऐडी चोटी को जोर लगा दिया था, उस मॉ को वृद्दा अवस्था में वेतन के रुप में मात्र दो-दो हजार रुपए देना उचित प्रतीत नहीं होता है। यह तो कोई कृतज्ञता नही हुई। उसी समय वह उठा। अलमारी में से बिना गिने नोटो की गडिडया, थैले में डालकर मॉ के पास भूतल पर आया। मॉ के चरणो में रुपयो भरा थैला और अपना सिर रखकर बोला-

‘‘ भूल क्षमा करे। जितना दान करना हो करें। जिसे जो देना हो दे दे। अलमारी की चाबी उपर ही रखी रहती हैं। आपको किसी को पूछनें की जरुरत नहीं है। आप अलमारी से स्वंय पैसे निकाल लेना। मैं आपके उपकारो का बदला चुकाने मे असमर्थ हूॅ। जब कमाने की कोई सीमा नहीं तो तुम्हे देने की सीमा क्यों रखु।‘‘

इसके बाद मॉ की पेटी खाली नहीं रह पाई। मॉ आनंद और संतोष से भर गई। उसने उस धन को सहेज कर रखा। उनका अंतिम समय आया और वह स्वर्गवासी हो गई। पूर्वजो को सामान और साधन दे देना ही पर्याप्त नहीं हैं। उन्हे आदर, सम्मान और समय देना भी निहायत जरुरी हैं। जो छोटे से उपकार के प्रति भी अहोभाव नहीं रखता हो, कृतज्ञता नहीं रखता हो, वह ह्रदय नही पत्थर ही कहा जाएगा। लैाकिक दृष्टि से विचार करे तो पिता धर का मस्तक है और मॉ, ह्रदय। इनके प्रति जितनी कृतज्ञता प्रकट की जाए, उतनी ही कम हैं।

...............अध्याय समाप्त..................

अगला ब्लॉग / भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे......... 



 
 
 

1 Comment


Bhag Chand Jat
Bhag Chand Jat
5 days ago

यह लेख केवल कृतज्ञता की बात नहीं करता, बल्कि उसे महसूस कराता है।

हर पंक्ति यह याद दिलाती है कि हम जिन चीज़ों को सामान्य मान लेते हैं, वही वास्तव में जीवन की सबसे बड़ी कृपा हैं।

माता-पिता के प्रति आभार वाला प्रसंग भीतर तक झकझोर देता है—सच है, उनके उपकारों का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता, केवल सम्मान और प्रेम से उसे महसूस किया जा सकता है।

यदि हर व्यक्ति इस भावना को जीवन में उतार ले, तो रिश्तों में कटुता की जगह अपनापन और जीवन में अशांति की जगह सच्चा आनंद आ जाएगा।

Like

About Me

WhatsApp Image 2025-..._imresizer.jpg

नमस्ते, मैं अय्यूब आनंद
आपका स्वागत करना मेरे लिए प्रसन्नता की बात है।

Osho the Great

Posts Archive

Keep Your Friends
Close & My Posts Closer.

"मुझे एक प्रार्थना भेजें,
और मैं आपको एक प्रार्थना वापस भेजूंगा।"

  • Twitter
  • Facebook
  • Instagram

Contact us

© 2035 by Ayub Khan Powered and secured by Wix

bottom of page