ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र (भाग-6)
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दिनांक : 09.08.2026

मैनें कई बार महसूस किया हैं कि जब हमारा हृदय प्रेम से भरा होता हैं तब अस्तित्व भी हमारी ओर प्रेम प्रवाहित करता हैं। यह भी अनुभव में आया हैं कि जब चित्त में घृणा के तत्व अत्याधिक मात्रा में प्रविष्ठ हो जाते है तब अस्तित्व की ओर से घृणा के अणु हमें घेरने लग जाते हैं। इस प्रकार हमारे चित्त की दशा से जिस प्रकार के अणु प्रवाहित होते है, वैसे ही अणु अस्तित्व हमारी तरफ बिखेरने लग जाता हैं। अतः ऐसे उपाय करे कि हम प्रेम से भर जाऍ। प्रेम का विस्तार करे तो बदले में हमें प्रेम मिलेगा। अन्ततः जीवन आनंद की दिशा खोजने मे मशगूल हो जाएगा।
प्रेम के साथ घृणा आती है। करुणा के साथ क्रूरता आती है। हमारे जीवन में घृणा, क्रूरता और क्रेाध का आगमन न्यूनतम से न्यूनतम हो, इसके लिए ओशो ने '’अद्वैत'’ नामक ध्यान प्रयोग दिया है। यह ध्यान प्रयोग बहुत छोटा हैं। लेकिन असरदार हैं। ओशो के अनुसार यह ध्यान प्रयोग एक मंत्र पर आधारित है। इस प्रयोग को तब आरंभ करते है जब, हमें महसूस होने लगे कि हमारे मन में द्वैत उत्पन्न हो रहा हैं। मन विभाजित हो रहा हैं। तब हमें बुलंद आवाज में अपने भीतर कहना होगा--अद्वैत। शर्त यह रहेगी कि हमे पूरे मनोयोग के साथ अद्वैत कहना होगा। अद्वैत शब्द का बुलंद आवाज में उच्चारण करते ही हमारा पूरा ध्यान, मात्र और मात्र अद्वैत शब्द पर ही रहना चाहिए। ओशो की शब्दावली के अनुसार अद्वैत का उच्चारण होशपूर्वक किया जाना चाहिए। यांत्रिक या रुटीन में नहीं। अद्वैत शब्द को भीतर कई बार दोहराना हैं। जब हमें लगे की हमारे भीतर प्रेम भाव उठ रहा हैं। जब हम स्वयं को प्रेममय स्थिति में महसूस करें तब बुलंद आवाज में भीतर कहना है--अद्वैत। यदि हम ऐसा नही कहेगें तो समझ लीजिए कि घृणा के आगमन के लिए मन के दरवाजे स्वतः ही खुल जाएगें और घृणा मन के आसन पर बिना बुलाए मेहमान की भॅाति विराजमान हो जाएगी।
प्रेम और घृणा एक ही सिक्के के दो पहलू है। हम प्रेममय हुए और घृणा के मेघ बरसने को आतुर हुए। घृणा के मेघ तो प्रेममय होते ही बरसने की तैयारी कर लेते हैं।
चूंकि प्रेम और घृणा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जैसे प्रेम की उत्पत्ति पर, घृणा दरवाजे पर खडी रहती हैं, उसी प्रकार घृणा के भावो की उत्पत्ति भी प्रेम के मेघो को बरसने का निमंत्रण देती हैं। ऐसे हालात में भी होशपूर्वक अद्वैत शब्द का कई बार उच्चारण करना होगा। इस शब्द का तब भी प्रयोग किया जा सकता है जब ऐसा लगे कि जीवन के साथ तादातम्य गहरा हो रहा हैं। जीवन और मृत्यु भी भिन्न-भिन्न नही है। जब मृत्यु का भय सताए तो भी भीतर कहना होगा-अद्वैत।
इन दशाओ में इस शब्द का उच्चारण बहुत महत्वपूर्ण है। इस शब्द के सकारात्मक परिणाम पाने के लिए पूरे बोध के साथ अद्वेत शब्द का उच्चारण करना होगा। हमारी पूरी अंतदृष्टि को इस शब्द के उच्चारण के समय संयुक्त करना होगा। सरल शब्दो में अद्वैत शब्द जी- -जान से बोलना होगा। यदि आप इस प्रयोग को पूरे मनोयोग से करते है तो आप पाएंगें कि शांति की परिया आकाश से उतर कर हमारे चित में शांति के तत्व प्रविष्ट कराने हेतु आतुर हो जाएगी। मन का सकारात्मक कोना प्रकाश की किरणो से भरने लगेगा।
ओशो ने हंसने पर बहुत जोर दिया है। मैने कई संतो और सुफियों को सुना और पढा है। किसी भी संत ने अपने प्रवचनो में चुटकलो को स्थान नहीं दिया हैं। ओशो ने जीवन और आध्यात्म के सभी पहलुओ पर संपूर्ण्ं मानवता का मार्गदर्शन किया है। धर्म को निरसता के जाल से बाहर लाकर, हास्य से धर्म का परिचय करवाया हैं। वे बार-बार जी खोलकर हॅसने का सुझाव देते हैं। उनकी आकांशा थी कि उनका आश्रम हास्य का प्रमुख केंद्र बने। आज देखिए हास्य क्लबो की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढती जा रही है। किसी भी पार्क मे चले जाइए, लोग समूहो में अपनी पूरी उर्जा के साथ हॅस रहे हैं। वे अपने गुबार को बाहर निकाल रहे हैं। उन्होने हास्य को रेचन का माध्यम बना लिया हैं। अब तो विश्व हास्य दिवस भी आयोजित किया जाने लगा है। मेरे विचार में ओशो प्रथम सदगुरु है जिन्होने मनुष्यता को हॅसने का अमूल्य उपहार दिया हैं।
जारी है ...................
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