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ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र (भाग-5)

  • 16 hours ago
  • 3 min read

दिनांक : 02.08.2026

मुखोटे ओढकर तो लोगो का सम्मान पाया जा सकता है। सम्मान देने वालो के चेहरे भी मुखोटो के नीचे दबे हुए हैं। सहजता से जैसे हो, वैसे प्रस्तुत करनें में सम्मान की अपेक्षा करना निराशा को आमंत्रित करने की वजह बन सकती हैं। मुखोटा उतारने के लिए साहस होना चाहिए। प्रबल अभिलाषा होनी चाहिए कि मुझे सहजता के राजपथ पर ही चलना हैं। साहस होना चाहिए कि लोगो की स्वीकृति मिले तो ठीक न मिले तो ठीक। सम्मान तभी मिल सकता है जबकि हम लोगो की वांछित और अवांछित शर्तो की पूर्ति करे। उनकी शर्तो को खारिज करके सम्मान पाना असंभव की सीमा तक कठिन हैं।

अवसादग्रस्त होने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब परमात्मा, हमें सहजता से अंगीकार कर रहा है तो लोगो के मान-अपमान की सार्थकता ही क्या रह जाती हैं? ओशो महान सुफी संत जुन्नेद के जीवन की कथा से स्पष्ट करते हैं कि जो परमात्मा को स्वीकार है, उसमें हस्तक्षेप करना हमारे क्षैत्राधिकार में नहीं आता हैं। जुन्नेद अपने सफर के दैारान एक घर में ठहरे हुए थे। वहॅा के स्थानीय व्यक्ति से जुन्नेद ने पूछा---

‘’ यह शोरगुल कैान कर रहा है?’’

‘’ पडैासी है। रोजाना ही शोरगुल करके परेशान करता है।'’

‘’ क्या उसे मालूम नही कि नमाज का वक्त हो गया है?’’

‘’ उसे सब कुछ मालूम हैं। वह जानबूझकर शोर कर रहा हैं।'’

‘’ वह ऐसा क्यों कर रहा है?’’

‘’ वह नमाज में खलल डालना चाहता है।'’

‘’ उसे क्या हासिल होगा ?’’

‘’ वह दुष्ट है। रोजाना नमाज के वक्त शोरगुल करना उसका स्वभाव है।

      सुफी संत जुन्नेद को बहुत बुरा लगा। नमाज के बाद उन्होने हाथ फैलाकर अल्लाह से दुआ की---

‘’ या,अल्लाह,यह कैसा शख्स है।लोगो की नमाज में जानबूझकर खलल डाल रहा हैं। इस दुष्ट को पृथ्वी ग्रह से उठा क्यो नही लेता। यह शख्स तेरी पृथ्वी पर रहने के काबिल नहीं हैं। पूरा मोहल्ला इसके हरामीपन से परेशान हैं। '’

कथा कहती है कि ऊपर से आवाज आई---

‘’ए जुन्नैद। मुझे इस शख्स से कोई परेशानी नहीं हैं। मैं इसे साठ साल से देख रहा हूँ। तुझे साठ घंटे में ही गिले-शिकवे हो गए। जब मैं साठ साल से इसे बर्दाश्त कर रहा हूँ तो कोई न कोई राज तो जरुर होगा।'’

कथा कहती है कि इस आवाज को सुनकर जुन्नैद मौन हो गए। फिर कभी शिकायत नहीं की। उस पडौसी को उसकी आदतो सहित सहर्ष् स्वीकार कर लिया। जुन्नैद ने मन ही मन कहा कि अल्लाह तेरी रजा तू ही जानता हैं। मेरे से भूल हो गई।

औशो का कहना हैं कि यदि परमात्मा के काम मे दखल देने के विचार शांत हो गए तो समझो, आसन लग गया। आनंद का झरोखा खुल गया। आलथी पालथी लगाकर बैठना अच्छा व्यायाम तो हो सकता है लेकिन उससे आत्मा नहीं मिल पाएगी। आत्‍मा तो परमात्‍मा की लीला को स्‍वीकार करने से ही मिल सकती हैं। स्‍वीकृति का भाव ही वास्‍तविक आसन की मुद्रा हैं।

मनुष्य के चित्त की स्थिति उसकी विचारधारा से निर्मित होती हैं। जैसी चित्त की स्थिति होगी। दुनिया भी वैसी ही नजर आएगी। चित्त की अवस्था से दुनिया का झरोखा दिखाई देता है। जो व्यक्ति स्वतः सदकर्मो की तरफ मुखातिब होता हैं तो सब लोग सदकर्मी दिखाई देने लगते हैं।

जारी है ...................

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1 Comment


Bhag Chand Jat
Bhag Chand Jat
11 hours ago

"आध्यात्मिकता का सार यही है कि मन शिकायत से मुक्त होकर स्वीकार करना सीख जाए। सुंदर लेख। 🌿

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