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विचारो के कैसे पाक-साफ करे? भाग-2

  • May 17
  • 4 min read

दिनांक : 17.05.2026

महिलाए तो अेार भी एक कदम आगे है। मोबाइल पर अकारण अनर्गल वार्तालाप करती ही चली जाती है। उनका वार्तालाप द्रोपदी के चीर की तरह बढता ही चला जाता हैं। सिर्फ काम की बात करने का तो औचित्य समझ में आता है लेकिन बेकाम की अनर्गल टीका टिप्पणियो को हम रस ले लेकर सुनते है तो यह अनर्गल टीका टिप्पणिया हमारे दिमाग के एक कोने में सेव हो जाती है। जो विचार भीतर चल रहे होते है वे ही वाणी के माध्यम से प्रकट होते है। हमारे भीतर क्या चल रहा है? क्यो चल रहा है? इसको जॉचने परखने की जरुरत हैं। हमे इन विचारो की उपयोगिता और वौछनियता पर मंथन करना होगा। जैसे भोजन करने से पूर्व हम निर्णय लेते हैं कि क्या खाना हैं और क्या नहीं खाना हैं? उसी प्रकार विचारो के बारे में भी निर्णय करना होगा कि किस प्रकार के विचारा आहार योग्य है और कौनसे विचार आहार योग्य नही है। कोई अशुभ विचार दिमाग में गहरा बैठ सकता हैं। अतः सतर्क रहना होगा। कई बार ऐसे विचारो का सतत स्मरण करने से वे सत्य भी हो सकते हैं। भगवान बुद्व ने तो अपने आरम्भिक काल में ही चेता दिया था कि विचार ही आगे चलकर वास्तविकता में परिवर्तित हो जाते है। आज जो हम विचार कर रहे है दिमाग उसके क्रियान्वन में जुट जाता हैं। ऐसे विचार आते ही सतर्क और सावधान होना पडेगा। विचारो की दिशा परिवर्तित करनी होगी। विचार का रुख सत्यम, शिवम सुदंरम की ओर करना बेहतर होगा। असत्य, अशुभ और असौदंर्य के प्रति विचार करना घातक हैं। ऐसे विचार उस मार्ग पर ले जाते है जो प्रगति और जीवन को सुखमय बनाने हेतु घातक है। हम जिस समाज मे पले बढे है, वहॉ नकारात्मक विचार स्वंय आ जाते हैं। उन्हे आमंत्रित करने की भी आवश्यकता नहीं हैं।

इसके विपरित, सकारात्मक और शुभ विचार, बिना बुलाए आने वाले नहीं हैं। शुभ विचारो को तो विधिवत आंमत्रित करना होगा अन्यथा शुभ विचारो का आगमन नही हो सकेगा। परंतु हम इस दिशा में जागृत नही है। अवेयर नहीं है। कब अशुभ विचार एक आक्रांता की भांति हमारे भीतर घुस जाते है, हमे पता हीं नहीं चलता। हमें सजग रहना होगा। यह परिस्थिति स्वंमेव घटित होनें वाली नहीं है क्योंकि सामाजिक संस्कारों की जंजीरो में जकडे हुए हम अशुतापूर्ण माहौल में रहे है। अतः जो विचार सत्यम, शिवम, सुदंरम की ओर ले जाए उन मार्गो का चुनाव करना पडेगा। उस राजपथ पर चलना होगा।

ओशो ने कहा हैं कि अशुभ विचारो से लडना नहीं है। लडाई किसी समस्या का स्थाई हल नहीं है। लडाई से कभी भी विजय पताका नहीं फहराई जा सकी है। लडाई से तो पराजय ही मिलती हैं।लडने वाले लोगो के जीवन में अशांति अैार अशुभ का प्रतिशत बढने लगता हैं।

विचारो की शुद्वि के अभियान में सर्वप्रथम सत्यम, शिवंम, सुदंरम से ओतप्रोत विचारो के लिए मन मस्तिष्क में स्थान आरक्षित करना होगा। अशुभ विचारो के लिए जब स्थान ही रिक्त नहीं होगा तो वह अशुभ विचार मन-मस्तिष्क में निवास कैसे कर पाएगें। जैसे किसी मेहमान को तरजीह देना बंद कर दिया जाए तो वह ज्यादा दिन रुक नहीं पाएगा। वह जान लेगा कि मेजबान हमें विदा करना वाहता हैं। उसी तरह हम सकारात्मक साहित्य का अध्ययन करे तो सकारात्मकता के बीज अवश्य ही भीतर जाएगे। उन बीजो को निरंतर सत्य, शुभ और सकारात्मक माहौल में रखा जाए तो वे बीज उसी माहौल के मुताबिक विकसित होकर पौधो का रुप ले लेंगे। जीवन महत्वपूर्ण है। इस जीवन को कचरा कूडा इकटठा करने मे लगा दिया तो जीवन में बदबू के सिवाय ओर कुछ हासिल नहीं होगा। चुनाव हमे ही करना होगा कि जीवन के कीमती समय को किन विचारो को एकत्रित करने में खर्च करे।

ओशो कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति तुम्हारे घर में कचरा डाल जाए तो तुम दो-दो हाथ करने को तैयार हो जाते हो। उसे किसी भी सूरत में कचरा नही डालने दोगे लेकिन कोई व्यक्ति व्यर्थ की अनर्गल वार्ता करके समय खराब करता है अर्थात हमारे दिमाग मे कूडा कचरा डालता है तो सजग रहना होगा। उन व्यर्थ विचारो को मस्तिष्क में स्थान नहीं देना है। वरना अशुद्व विचारों का दिमाग में बहुमत हो जाएगा और हम अपने दैनिक कार्यो को करने मे भी असुविधा अनुभव करेगें।

यदि हम मनोवैज्ञानिको से पूछे कि निंदा, चुगली, वैमनस्य और द्वेष जीवन को किस प्रकार प्रभावित करते है तो वे आपको बजाएंगे कि अभी तक का जीवन मात्र, इनके अलावा ओर किसी भाव से प्रभावित ही नहीं हुआ हैं। विचारो की इस श्रृखला ने मानव की एकाग्रचित्ता और आनंद को बंधक बना लिया है। ऐसे अशुभ विचारो के कारण हम पिंजरे में बंद तोते की तरह हो गए हैं। जिसे यदि पिंजरे के बाहर निकालना भी चाहे तो वह अपने पंजो से पिंजरे के तारो को मजबूती से पकड लेगा। इतने बरसो कैदी का जीवन जीने के बाद वह मुक्त गगन में पंख फैलाकर विचरण करने की ईच्छा को ही भूल गया हैं।

जारी है ...................

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