ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र (भाग-2)
दिनांक : 12.07.2026

ध्यान से विवेक जागृत होता है। मानवता के गुण आते है। हृदय में धन्यवाद का भाव जागृत होता हैं। मैने बरसो एक सदगुरु श्री लल्लू लाल सैनी के सानिध्य में निरंतर ध्यान प्रयोग किए तो बोध विकसित हुआ। इस बोध की उत्पत्ति के उपरान्त अप्रीतिकर धटनाओ की जगह प्रीतिकर घटनाओ को बार-बार याद करना आरंभ किया है। फोकस करने का बिंदू बदल गया। बार-बार प्रीतिकर घटनाओ को याद करने से प्रीति का दायरा विकसित होकर हमारे चारो तरफ फैलने लगता है।
ओशो ने बार-बार कहा है कि जब ध्यान में शांति का अवतरण हो तो फुरसत के लम्हो में उस शांति को फिर से अनुभव करे। वह शांति हमें आनंदित करेगी। उदाहरण के तौर पर उस दिन हमने आती जाती श्वॉस पर ध्यान किया था। होशपूर्वक भीतर ली गई श्वांस से शीतलता का अनुभव हुआ था। आज फुरसत के क्षणो मे पार्क में बैठे हुए, उस शीतलता को पुनः महसूस करने के लिए आती-जाती श्वास पर ध्यान करे तो पहले से ज्यादा शीतलता महसूस होगी। हमारे आनंद का केंद्र भी उसी अनुपात मे विकसित होगा।
ऐसा प्रयोग किसी भी समय व स्थान पर किया जा सकता है। रेल में सफर कर रहे है। आंखे बंद की। पुनः उस दिन की भॅाति आती-जाती श्वॉस को देखने लग गए। कुछ समय बाद आप अनुभव करेगें कि चित्त पर शांति के मेघ छाने लगे हैं। इसे दिन मे जितनी बार करना चाहे कर सकते है। हर बार यह भी अनुभव में आएगा कि चिंता और दुख का घेरा सिकुडने लगा हैं। धीरे-धीरे ऐसा समय भी आएगा, जब हमें बलपूर्वक उन यादगार लम्हो को याद नहीं करना पडेगा बल्कि वे लम्हे स्वतः ही याद आते चले जाएगें।
ओशो एक सरल प्रयोग और सुझाते हैं। ओशो के अनुसार संकल्प में बहुत शक्ति होती हैं। रात को सोने से पहले आती-जाती श्वांस को देखने से पहले मन में भाव करे कि मुझे ध्यान में जो शांति और आनंद की अनुभूति होगी, वह अनुभूति चैाबीस घंटे निरंतर बनी रहें। यह संकंल्प भी कर सकते है कि मै इस ध्यान से हासिल होने वाले सुखद अहसास को चैाबीस घंटे बनाए रखुगॅा। आप आश्चर्य करेंगे कि इस संकल्प से ध्यान में हासिल हुई, चित्त की शांति की प्रतीति निरंतर बनी हुई हैं। रोजाना सोने से पहले इस प्रयोग से चित्त में शांति अवतरित होना शुरु हो जाएगी। इस प्रकार फुरसत के क्षणो का सदुपयोग किया जा सकता हैं। इस संकल्प की पुनरावृति करने से संकल्प का नवीनीकरण होता रहेगा। इस पुनरावृति से संकल्प मस्तिष्क में जीवित रह सकेगा। हमारा चित्त संकल्प के प्रति सजग रह पाएगा।
अप्रीतिकर घटनाओ को याद करने से अतीत के अशुभ पन्ने खुलने लगते हैं। जैसे किसी व्यक्ति ने पाँच वर्ष पूर्व अपमानजनक बाते कही थी। उस समय भी खून खोलने लगा था। श्वॉस की रफतार तेज हो गई थी। आज भी उस घटना को याद करके देख लो पुनः उसी मनोस्थिति में पहुँच जाओगे। वह अतीत की मनोस्थिति फिर गुस्से और संताप का सबब बन जाएगी। इसलिए प्रीतिकर घटनाओ की यादो को बार-बार याद करना और अप्रीतिकर घटनाओ को स्मृति से डिलीट करना ही श्रेस्कर हैं। यह भी सत्य हैं कि स्मृतियो को डिलीट करना असंभव की सीमा तक कठिन है। अप्रीतिकर और अपमानजनक घटनाओ का मौके बेमौके बखान नही करने से यह स्मृति के किसी कोने में सुसुप्त अवस्था में पडी रहेगी। अप्रीतिकर वारदातो को याद नही करने से वे हमारे जीवन को प्रभावित नही कर पाएगी।
ओशो के शब्दो में--’’विधायक, अनुभूतियो का स्मरण बहुमूल्य हैं। उन अनुभूतियो को निरंतर स्मरण करनें से दो बाते होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह होगी कि अगर आप विधायक अनुभूतियों का स्मरण करते हैं तो उन अनुभूतियों के वापस पैदा होनें की संभावना आपके भीतर बढ जाएगी। जो आदमी घृणा की बातों को बार-बार याद करता हैं तो यह संभावना प्रबल हो जाएगी कि आज भी घृणा की घटना घटित हो जाए। जो आदमी उदासी की बातो को बार-बार स्मरण करता हो तो यह संभावना बन जाएगी कि आज फिर वह उदास हो जाए। क्योकिं उससे एक तरह के झुकाव पैदा हो जाते हैं और वही बातें उसमें पुनरुक्त हो जाती है। यह जो भाव हैं, स्थाई बन जाते हैं और जीवन में उन भावो का बार-बार पैदा हो जाना आसान हो जाता हैं।'’
बच्चो को विधायक अनुभव बताकर उनके विवेक को जागृत करना प्रत्येक माता-पिता का कर्तव्य हैं। उन पर थोपे गए शिष्टाचार उनके विवेक को जागृत नहीं होनें देगें। बालमन का विवेक जागृत करने का बेहतरीन तरीका है, उन्हे स्वंय निर्णय लेने में सक्षम बनाना । ऐसा तभी हो सकता हैं, जब हम उनके जीवन के फूल को खिलने का अवसर उपलब्ध कराए। जब बालमन में विवेक जागृति के बीज अंकुरित हो जाएगें तो कुंठा नामक खरपतवार स्वमेंव कम होती चली जाएगी। वह बालक के वास्तविक विकास में सहयोगी रहेगी।
वैज्ञानिक स्वीकार चुके हैं कि हमारे सोचने की दिशा ही हमारा वर्तमान और भविष्य निर्धारित करती हैं। बालमन पर विचार और मान्यताए थोप दी जाती है तो बालमन, उन थोपे गए विचारो के दायरे में झटपटाकर कुंठित होता रहता है। यह कुंठा, जीवन भर पीछा नहीं छोडती हैं। बालक, जब युवा होता है तब थोपे गए विचारो का जखीरा उसके विवेक को दीमक की तरह नुकसान पहुँचाने लगता है। युवामन अपने स्वभाव से भटक जाता हैं तब अवसाद के कीटाणु उसके मस्तिष्क में प्रविष्ट होने लगते है। अवसाद के कीटाणु न तो उसे उसके स्वभाव के अनुरुप जीने देते हैं और न ही उसे वो होने देते है जो वह होने को इस पृथ्वी ग्रह पर आया था। इसी खींचतान के बीच जीवन को आनंदित करने वाले लम्हे गुजरते चले जाते हैं। आनंद तो दूर, चेहरे पर वास्तविक मुस्कान के भी लाले पड जाते हैं।
जारी है ...................
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