ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र (भाग-1)
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दिनांक : 05.07.2026
अध्याय : ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र

ओशो का मानना है कि जब नवजात शिशु के रुप में हम पहली बार धरती पर श्वॅास लेते है, तब कोरे और पवित्र कागज की भॅाति होते है। धीरे-धीरे नवजात को जबरदस्ती बोलना और मुस्कुराने का अभ्यास कराया जाने लगता हैं। उसे वह सब कुछ सिखाने की प्रतियोगिता शुरु होती है जिसकी समाज अपेक्षा करता है। उसे आगंतुक को अभिवादन करनें का सलीका सिखाया जाने लगता है। जब बालक किसी को अभिवादन नहीं करता है तब उसे अभिवादन करने हेतु मजबूर किया जाता है। बालक परिजनो पर आश्रित होता हैं। अतः अनिच्छा से वह अभिवादन तो करता है लेकिन ऐसे अभिवादन में श्रद्धा का अभाव बालक की भाव भंगिमा से साफ नजर आता हैं।
मेरे विचार में अभिवादन से वार्तालाप का सिलसिला शुरु करने में आसानी होती है। अभिवादन के ढंग प्रत्येक धर्म, देश और वातावरण से शासित होते हैं। यदि बालक को अभिवादन से होनें वाले लाभ समझाए जाए तो बालक के लिए एक विकल्प पैदा हो जाता है। उसके विवेक को जागृत करनें हेतु अभिवादन की समाज में अनिवार्यता को समझाना जरुरी है। जैसे-जैसे बालक की आयु बढेगी तो वह अपने विवेक से अभिवादन की संकल्पना पर चिंतन आरंभ करेगा। उस पर प्रत्येक आगंतुक को अभिवादन करने की अनिवार्यता थोपी जाने से वह भयग्रस्त होकर अभिवादन तो कर लेगा परंतु वह अभिवादन दो कोडी का होगा। उसमें रस नहीं होगा। उसमें श्रद्धा नही होगी। वह अभिवादन सूखा-सूखा होगा। जिसे, अभिवादन किया गया है, उसके हृदय की वीणा के तारो पर कोई झंकार उत्पन्न नहीं होगी। वह अभिवादन यांत्रिक होगा।
बालक का विवेक जागृत करने पर ओशो ने बहुत जोर दिया है। अभिवादन की पूरी अवधारणा को बिना किसी पूर्वाग्रह के बालक को समझााई जावे तो वह अपने स्तर पर तय करेगा कि उसे कब और किसे अभिवादन करना चाहिए या नहीं। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हॅू कि जिन बालको पर अभिवादन करने का दबाव डाला जाता है वे बालक अभिवादन तो कर लेते है लेकिन उससे आगंतुक का मन प्रसन्न नही होता है। आगंतुक भी उसका रुखा सा जवाब देकर इतिश्री कर लेता है। जब हम पूर्ण श्रद्धा के साथ अभिवादन करते है तो निश्चित रुप से अभिवादनगृहिता के हृदय से हमारे हृदय के तार जुडेगें। विवेक और श्रृददा से किया गया अभिवादन आनंद का स्त्रोत बन सकता हैं।
जीवन में जिन कारणो से हमने पीडा और संताप को झेला है, उनका विश्लेषण करना अतिआवश्यक हैं। ऐसा विश्लेषण करते समय मस्तिष्क का केंद्र बिंदू, यह होना चाहिए कि यह दुख, संताप, पीडा, बैचेनी और अशुद्द भावो के लिए हम स्वंय जिम्मेदार है। हम किसी दूसरे पर दोषारोपण नहीं करे। स्वंय के दुख के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहराना कहॅा की समझदारी हैं? इस बात को सदैव स्मरण रखना होगा कि न तो दूसरा हमे सुख दे सकता है और न ही दुख दे सकता हैं।
जीवन की जो गलिया, सत्यम, शिवम और सुंदरम की मंजिल तक ले जा सकती थी। हमने उन गलियो को अपना जीवन मार्ग नहीं बनाया। हमारा चलना होशपूर्वक नहीं रहा। हमने विवेक को जागृत करने की दिशा पर गमन नहीं किया। इस बेहोशी और विवेकशून्यता से बालक को दूर रखे। उसे ऐसे कृत्यो को करने के लिए प्रेरित नही करे जिनसे हमे दुख, पीडा और संताप झेलने पडे हैं। हम भी तो पृथ्वी पर कोरे कागज की भांति आए थे। जो कुछ, इस कोरे कागज पर हमने बेहोशी में लिखा, उसने जीवन को विवेकशून्यता का उपहार दिया। अब हमारी उपलब्धि यह हो सकती हैं कि नई पीढी को यह उपहार न दे। नई पीढी को जरुरत हैं होश की, विवेक की, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की। हम उन पर, हमारे अतार्किक विचार थोपने से परहेज करे। जिन अवधारणाओ के कारण हम दुखी रहे, उन्हे थोपे नही। वरना नई पीढी भी दुख और पीडा के सागर में गोते लगाती रहेगी।
मेरा यह अनुभव रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में प्रीतिकर और अप्रीतिकर घटनाऍ घटित होती रहती है। हम सिर्फ अप्रतिकर घटनाओ का बोझ जीवन भर ढोते रहते हैं। बार-बार इन्हे याद करके दुखी होते रहते है। एक दूसरा पहलू और भी हैं कि हम बार-बार सुखद और प्रीतिकर घटनाओ का स्मरण करने लग जाए तो जीवन में आनंद की कुछ झलके अनुभव में आना प्रारंभ हो जाएगी। इस दिशा में हमने विशेष प्रयास नही किए है।
जारी है ...................
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