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What Are Emotions Called? (Part - 11) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 11)

  • ayubkhantonk
  • Oct 19
  • 3 min read

दिनांक : 19.10.2025

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सर्वप्रथम हमें शुद्द अैार अशुद्द भावो की संकल्पना को समझना होगा। अशुद्द, भाव वे होते है जो भीतर से उत्पन्न न होकर बाहर की किसी घटना की प्रतिक्रिया होते हैं। ओशो ने चित्त की अवस्था को शुद्द भाव की संज्ञा दी हैं। चित्त की अवस्था से निकले भाव, चित्त को शांति और सुकून देते हैं। इनसे अंतस के विकास का झरोखा खुलता हैं। शुद्द और अशुदद भावो के पहचान की कसौटी यह हैं कि यदि कोई भाव हमारे भीतर से आता है तो वह शुद्द भाव होगा। यदि कोई भाव अन्य व्यक्ति के कृत्य या घटना से जन्म लेता हैं तो वह भाव अशुद्द होगा। अशुद्द भावो की अधिक मात्रा में उत्पत्ति हमारे भीतर बैचेनी, क्रोध और वैमनस्यता को पैदा कर सकता हैं। कोई व्यक्ति सवेरे की सैर में हमे विन्रमता से अभिवादन करे तो मन में प्रसन्नता का भाव उत्पन्न होता है। यह भाव शुद्द नहीं है। यह उस व्यक्ति के विनम्रतापूर्ण अभिवादन की प्रतिक्रिया है। इसके विपरीत कोई व्यक्ति हमारे से मिलते समय कटु वचनो का प्रयोग करता है तो क्रोध के भाव उत्पन्न होते हैं। यह क्रोध के भाव, कटु वचनो के श्रृवण से अस्तित्व में आए हैं। यह भाव, प्रतिक्रिया होने से अशुद्द भाव की श्रेणी में आएगें।

भावो के शुद्दिकरण की श्रृखला में मैत्री की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी गई है। जीवन में मैत्री का आगमन स्वतः संभव नहीं है। मैत्री को निमत्रंण देना होगा। मैत्री को जीवन का अंग बनाने के लिए साधना करनी होगी। हम जिस समाजिक जीवन के अंग है। वहॉ मैत्री का विकास स्वतः संभव नहीं है। ओशो कहते है कि सबके के भीतर मैत्री के केंद्र मौजूद हैं लेकिन जीवन की जटिल प्रक्रिया के कारण, यह केंद्र जीवन भर अविकसित रह जाते है। मैत्री और प्रेम को विकसित होने के लिए अभयपूर्ण भूमि की आवश्यकता होती है। जब तक भूमि में अभय के तत्व नही होगें, मैत्री और प्रेम का वृक्ष कभी भी पुष्पित और पल्लवित नही होगा। मैत्री की साधना के लिए प्रथम सोपान लोगो की निस्वार्थ सेवा हो सकती है। इस सोपान का विस्तार मानव मात्र तक सीमित नहीं होकर पशु-पक्षियो, और संपूर्ण कायनात के प्रति हैं।

किसी विशेष धर्म के अनुयायी, अंधेरे में कीट पंतंगो के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। उन्हे सिखाया जाता हैं कि रात्रि में भोजन करने से सूक्ष्म कीट-पतंगो के जीवन को क्षति हो सकती हैं। यदि ऐसे लोग स्वाभाविक रुप से हिंसा न करने के प्रयोजन से रात्रि में भोजन का निषेध करते है तो यह अंहिसा है। इस भावना का उदभव करुणा से हुआ हैं। एक दूसरा पहलू भी हैं। जहॉ किसी धर्म विशेष के अनुयायी अपने पुरखो की आदतो के अनुसरण में अंधेरे में भोजन नहीं करते हैं, वहॉ ओशो ने इसे आदत की संज्ञा देते हुए, इस कृत्य को अंहिसा की श्रेणी में समाहित नहीं किया हैं।

समाज में लोगो को नाराज न करने के प्रयोजन से विनम्र शब्दावली का प्रयोग किया जाना शिष्टाचार का तकाजा हैं। ऐसी विनम्रता सामाजिक व्यवस्था का अंग हो सकती है। इसे मैत्री नही माना जाना चाहिए। मैत्री तो साधना से ही आएगी। इस साधना का शुभारंभ प्रकृत्ति के प्रति प्रेम भेजकर किया जा सकता हैं। ओशो का कहना हैं कि हमारे भीतर इतनी कटुता हैं कि हमें संपूर्ण मानव जगत के प्रति प्रेम संदेश भेजने में अडचन हो सकती है इसलिए, नदी और पहाडो को प्रेम और मैत्री का संदेश भेजना सरल एवंम सुकर रहा हैं। पुरानें दिनो में, सूर्योदय के दर्शन कर अहोभाव प्रकट करना मैत्री को अभिव्यक्त करने का पवित्र ढंग था। नदी को माता के समकक्ष मानकर नदी के प्रति श्रृदा भाव प्रकट करना मैत्री के विस्तार का तरीका था। चॉद को मामा के रिश्ते से संबोधित करना भी चॅाद के प्रति मैत्री का संदेश देने की हमारी अभिलााषा रही हैं।। यह अहोभाव, यह अभिव्यक्ति,यह श्रृददा के भाव, प्रकृति के प्रति प्रेममय होने के ही प्रयोग थे।

आगे जारी है......... 

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3 Comments


shafiqueknua30
Oct 19

समस्त सृष्टि या प्रकृति से मैत्री भाव का सन्देश।

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Bhag Chand Jat
Bhag Chand Jat
Oct 19

बहुत सुंदर और गहन विचार। ओशो ने शुद्ध और अशुद्ध भावों के अंतर को बड़ी सहजता से समझाया है। वास्तव में मैत्री और करुणा ही भावों की शुद्धता का आधार हैं।”


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Sikandar Khan Niazi
Sikandar Khan Niazi
Oct 19

तमाम मख्लूक से मुहोब्बत ही खालिक का रास्ता है।

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आपका स्वागत करना मेरे लिए प्रसन्नता की बात है।

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