विचारो के कैसे पाक-साफ करे? भाग-7
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दिनांक : 21.06.2026

अेाशो के अनुसार इन दोनो कृत्यो की दिशाए विपरीत है। यह तो ऐसे ही हुआ जैसे किसी ने बैलगाडी के दोनो तरफ बैल जोत दिए। अब बैलो को हांकेगें तो बैलगाडी के टूटने अलावा कोई परिणाम सामने नहीं आएगा। वह बैलगाडी किसी भी सूरत में यात्रा का माध्यम तो नहीं बन पाएगी। इसी प्रकार धन का चिंतन अैार समाधि प्राप्ति की अभिलाषा में उत्तरी अैार दक्षिणी ध्रुव जितना फासला हैं। दोनो कार्य एक साथ फलित होना असंभव की सीमा तक कठिन हैं।
कौनसा कृत्य या विचार शुभ है अैार कैानसा कृत्य या विचार अशुभ हैं। इसे परेखने का मापदंड क्या हैं? कैसे हमें पता चले कि हमारे कृत्य अैार विचार शुभ हैं या अशुभ?
अेाशो मन अैार मस्तिष्क के अदृश्य तलो की गहराई में जाकर जो कसैाटियॅा अविष्कृत करते है, वे एक दम कॅुवारी हैं। किसी संत या मनोवैज्ञानिक ने इतने गहरे उतर कर कसौटिया इजाद नहीं की है। अेाशो ने कृत्यो अैार विचारो के शुभ-अशुभ की परख करने हेतु हमे उपहार स्वरुप कसैाटिया दी हैं। उनका कहना था कि किसी कार्य को शुरु करने से पहलें दो क्षण, चिंतन के लिए आरक्षित कर दे। इन दो क्षणों में सोचे कि यह कार्य सत्यंम, शिवम सुंदरम के अनुकूल है या प्रतिकूल? यदि यह कार्य प्रतिकूल है तो उसे नहीं करें। कार्य की प्रकृति अैार परिणाम, इस कसौटी के अनुकूल होगें तो कृत्य के क्रियानवयन के दैारान ही तृप्ति का अहसास होगा। ओशो ने कहा कि उसके बाद तुम्हारे चलने-फिरने, बोलने चालने अैार वार्तालाप के ढंग में परिवर्तन दिखाई देने लगेगा। यह परख हमारे जीवन की दशा अैार दिशा दोनो बदल सकती हैं।
अेाशेा के अनुसार सत्यम, शिवम, सुंदरम मे से एक भी केंद्र विकसित हुआ तो शुभ है। उस केंद्र का दीया दूसरी दो कसैाटियो के दीयो को प्रकाशित कर देगा।
अेाशो के शब्दो में ---’’यह हो सकता हैं कि आप सब के केंद्र अलग-अलग हो। लेकिन एक केंद्र भी जग जाए, तो भी आप जगने शुरु हो गए। अगर कोई व्यक्ति सौंदर्य को ठीक से प्रेम करने लगे तो वह असत्य नहीं बोल पाएगा। क्योंकि असत्य बोलना, बडी असुूदर बात हैं, बडी कुरुप बात हैं। अगर कोई व्यक्ति सुंदर को ठीक से प्रेम करने लगे तो, वह अशुभ कृत्य नहीं कर सकता हैं, क्योंकि अशुभ कृत्य कुरुप होता हैं। तो अगर उसकी सौंदर्य के प्रति भी पूरी आकांक्षा पैदा हो जाए, तो भी बहुत कुछ हो जाएगा।'’
इन तीनो बिंदुअेा में जो हमें प्रीतिकर लगे उसे विकसित करने की दिशा में निरंतर कार्य करने की अेाशो ने छूट दी हैं। इसका कारण यह हैं कि एक बिंदू का विकास दूसरे बिंदू की अेार जाने का मार्ग प्रशस्त करेगा। अेाशो की यह भी चेतावनी हैं कि दिमाग में अनर्गल अैार अशुभ विचारो के स्त्रोत को प्रविष्ट होने की सुविधा नहीं दे। ऐसा साहित्य पढे जो सत्यम, शिवम, सुंदरम की यात्रा में सहभागी हो। प्रकृति का सानिध्य भी विचारो के शुद्दिकरण मे ताजगी लाएगा। बुद्द पुरुषो का सत्संग जीवन को रुपातंरित करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया हैं।
अेाशेा का मानना था कि प्रत्येक शहर, गॅाव व प्रदेश में हमेशा सदपुरुषो का आवास रहा है। प्रत्येक काल व समय में सदपुरुषो ने अपने व्यवहार अैार जीवन शैली से लोगो को सत्यम, शिवम, सुंदरम की राह पर गमन करने में सहयोग किया हैं। इतना आवश्यक हैं कि ऐसे लोगो के संपर्क में आने की हमारी चाहत हो। चाहत, सदपुरुषो के घर का मार्ग स्वयं खोज लेती हैं। यह भी संभव हैं कि ऐसे पुरुषो में सदता का उतना तत्व न हो जितना शास्त्रो में लिखा हुआ हैं। फिर भी इनका सानिध्य हमें मार्गदर्शित करता रहेगा। इनके सकारात्मका के घेरे में रहने से हमारी सकारात्मकता की वृति में वृद्दि होगी। उसकी आंशिक सदता की सुगंध से हमारे विचार अप्रभावित न रह सकेगें।
जारी है ...................
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