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ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र (भाग-9)

  • 18 hours ago
  • 3 min read

दिनांक : 06.09.2026

उन्हे यकीन करने में देा मिनिट का समय लगा कि मैनें जो कहा, उन्होने वो ही सुना या नही। जब उन्हे इत्मीनान हो गया कि उन्होने वो ही सुना है जो मैने कहा है। वे अवाक रह गए। हिम्मत जुटाकर कहा--

’’ सर। एल०टी०सी० का ब्लॅाक समय गुजर जाने के बाद तो यह सुविधा लैप्स हो जाती है। आपकी तो सभी एल०टी०सी० सुविधाए लेप्स हो गई होगी।'’

उनके चेहरे पर आश्चर्य की रेखाओ ने डेरा जमा लिया। वह बार-बार मुझे इस तरह से देख रहे थे जैसे कि मैनें घोषणा कर दी हो कि आज सूरज पूरब के बजाय पश्चिम से उदय होगा।

मैंने उनके दिमाग में उमड घुमड रहे आश्चर्य के मेघो को शांत करने का इरादा करते हुए बस इतना ही कहा-- ‘’ मुझे मालूम है। जब ब्लॅाक समय के भीतर एल०टी०सी० का उपयोग नही करते है तो एल०टी०सी० की सुविधा स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।'’

‘’ आपने इतनी बडी तादाद में मिलने वाली एल०टी०सीज० को लेप्स क्यों होने दिया?’’

‘’मनोरजंन की आवश्यकता, उसे होती है, जिसका मन रंजित हो। बैचेन हो। मैने हर नए दिन की नवीनता को पूरा सम्मान दिया। प्रत्येक दिन का तहे दिल से स्वागत किया। प्रत्येक दिन के अदालती काम को हमेशा अतीत के काम से अलग समझा। सोचो, जब दो आदमियो की शक्ले एक जैसी नहीं हो सकती तब दो मुकदमें एक जैसे कैसे हो सकते है? वारदात पूर्णतः समान नहीं होती तो दो गवाहो के बयान एक जैसे होना नामुमकिन हैं। नित्त, नूतन ही घटित होता हैं। इसलिए मुझे मुकदमें कभी एक जैसे नही लगें। मेरी दृष्टि अपराध की उत्पत्ति की जडो को खोजने में लगी रहती हैं। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि बोरियत के कीटाणुओ से घिर गया हूँ। इन कीटाणुओ की उत्पत्ति का स्त्रोत है-काम को बोझ समझ कर करना। मैनें उत्सव, आनंद और इबादत की तरह काम किया। जब हमारा दैनिक काम ही उत्सव, आनंद और इबादत बन जाए, तब न तो मनोरंजन की जरुरत पडती हैं और न ही एल०टी०सी० की।'’ इतना कहने के बाद मुझे महसूस हुआ कि शायद वे बोरियत के भाव को पूरी तरह समझ चुके हैं।

'’ लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि दूसरो को सरकारी खर्चे पर भारत भ्रमण करते हुए, आपके मन में यह ख्‍याल नहीं आया कि आप भी इस सरकारी सुविधा का पूरा लुत्फ उठाए?’’

मुझे लगा कि यह प्रश्न उन्होनें अपनी झेंप को दूर करने के लिए उछाला हैं। मैने ओशेा के किसी प्रवचन के अंश को इस प्रश्न का उत्तर बनाया। मैनें स्मृति के आधार पर उनको मन की अवधारणा कुछ इस तरह समझाई--

‘’ मनुष्य बहुचित्तवान हैं। हमारी एक चित्त की धारणा गलत हैं। हमारे चित्त में बहुत सारे मन हैं। यह सभी मन एक साथ कार्य करते हैं। यही चित्त कभी गुस्से से इतना गरम हो जाता है कि समझाईश के छींटो से भी ठंडा नही होता। खून में उबाल, इस तरह आता हैं कि हम मरने-मारने पर उतारु हो जाते हैं। जब गुस्से का बुखार उतर जाता है तब पश्चाताप के भाव पैदा होते है। एक ही मन होता तो दो विपरित ध्रुवो पर गति नहीं करता। अतःअपने काम को पूजा समझने पर मन, विभिन्न खण्डो में विभाजित नहीं होता। हमें ही खोजना होगा कि हमारा मूल स्वभाव क्या हैं? इस खोज में गहरे जाएगें तो ज्ञात होगा कि अरे, मेरा मूल स्वभाव तो कुछ ओर था। मैने अलग तरह का मुखोटा ओढकर मूल स्वभाव को बदलने की कोशिश की है। इस कोशिश से तो पाखंड पैदा हुआ। पांखड ने बोरियत को जन्म दिया। मैनें स्वंय को वैसा ही प्रकट किया जैसा मेरा मूल स्वभाव हैं। यही कारण हैं कि साथी जजो के सरकारी खर्चे पर भारत भ्रमण से मेंरे मन में उनके प्रति कभी जलन पैदा नहीं हुई। मेरा कर्मस्थल ही भ्रमण का केंद्र बन गया।'’

वह एकाग्रचित होकर मेरा जवाब सुनते रहे। मेरा जवाब पूरा हुआ। वे बडे प्रेम के साथ कुर्सी से उठे। एक मुस्कान चेहरे पर फैलने दी। अभिवादन के लिए दोनो हाथ जोड कर बोले--

’’ अब मै, एल०टी०सी लेकर कश्मीर भ्रमण करने नहीं जाउॅगा। शायद अब मुझे हर दिन, हर मुकदमा नया लगेगा।'’

जारी है ...................

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