ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र (भाग-8)
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दिनांक : 30.08.2026

मुझे महसूस हुआ कि उनके चेहरे पर असंतुष्टि के भाव गर्दिश कर रहे है। वे मेरे अधीनस्थ थे इसलिए बोरियत की असली समस्या खुलकर बता नही पा रहे थे। मैने उनके मनोभावों को समझा। वे खुलकर अपनी पीडा बेहिचक बयां कर सके इसलिए मैने उनकी तरफ एक मुस्कान फैंकते हुए उनका मनोबल बढाने कोशिश शुरु की--
‘’ मुझे यह जानकर खुशी हुई की आप घटना की गहराई में जाकर हकीकत को रिकार्ड पर लाना चाहते हैं। सभी जजो को ऐसी कोशिश करनी चाहिए। आप को यह भी जानकारी होगी कि अदालत को कानून में अख्तियार है कि वह भी सच्चाई को सामने लाने के लिए गवाह से कितने ही सवाल पूछ सकती है।'’
उनके मनोबल में इजाफा हुआ। वे अब सहज महसूस करने लगे।- बोले--
’’जब गवाहो के बयान लिखे जा रहे होते है, तब मैं धीरे-धीरे छोटे प्रकरणो को निपटाता रहता हूँ। सिर्फ गवाह के बयानो पर ही ध्यान केद्रित रखू तो पेशी की दूसरी फाइले नहीं निपट पाएगी। फिर तो पॅाच बजे तक कॅाज लिस्ट पूरी ही नही हो पाएगी।'’ उन्होने व्यावहारिक कठिनाई को उजागर करने का प्रयास किया।
‘’आप दो नावों पर एक साथ सफर नहीं कर सकते। या तो कॅाज लिस्ट को पूरी करो या फिर सच्चाई की तह तक जाने के लिए गवाह से अदालती सवाल पूछो। यदि आप प्रथम विकल्प को अपनाते हैं तो आप बोरियत से बच नहीं पाएगें। आपको अदालती काम बोझिल प्रकृति का लगेगा। यदि आप दूसरे विकल्प को अपनाते हैं तो आपको सुकून मिलेगा। प्रत्येक काम में आनंद आएगा। बोरियत के तत्व प्रविष्ट होने से परहेज करेगें। शाम छः बजे तक अदालत चलानी होगी। इस अतिरिक्त एक घटें में आपके सभी काम पूरे हो जाएगें। गवाह की सत्यता को परखने की चाहत पूरी हो जाएगी तो कुंठा से बचाव हो सकेगा। यह कुठां ही बोरियत के पौधे को विकसित करनें में खाद, पानी और प्रकाश की व्यवस्था करती हैं।'’ मैने सोचा कि उनकी समस्या दूर हो गई होगी इसलिए अपनी वाणी को विराम दे दिया।
इसके बावजूद भी वे असंतुष्ट दिखाई दे रहे थे। उन्होने पहलू बदला और कहने लगे-- ’’सर। छः बजे के बाद घर जाउॅगा तो बच्चो को होम वर्क कैसे करा पाउगॅा? मै मेरे दोनो बच्चो को साढे पॅाच से सात बजे तक होम वर्क करवाता हूँ। अगर मै साढे छः से आठ बजे तक बच्चो को होम वर्क करवाउ तो बच्चो का टीवी सीरीअल छूट जाता हैं। माफी चाहॅूगा सर। मैं छः बजे तक अदालत में नहीं बैठ पाउॅगा।'’
मैनें कोइ प्रतिउत्तर नही दिया। मैं जरुरी फाइलो पर हस्ताक्षर करने लगा। प्रतिउत्तर न पाकर, वे कहते ही चले गए--
’’सर, मै एक ही तरह का काम करते-करते बोरियत महसूस कर रहा हूँ। अगर आप एल०टी०सी० मंजूर कर दे तो मै एक हफते तक कश्मीर का भ्रमण कर आउ। बोरियत भी दूर होगी और कश्मीर की वादियो से सकारात्मक उर्जा भी हासिल होगी। वापस आकर काम करने में दिल लगने लग जाएगा।'’ फिर, वे मेरी तरफ उम्मीद भरी नजरो से देखने लगे।
इसी दौरान सभी फाइलो पर साईन करके, मैनें चाय मंगवाई।
जब मै तस्सली से चाय पी रहा था, तब, वें बिना पलक झपके , मेरे चेहरे के भावो का पढने का प्रयास कर रहे थे। उनकी जिज्ञासा परवान चढने लगी तो बिना सवाल किए नही रह पाए।
'’सर। आप की सर्विस बत्तीस साल की हो गई। आपने तो एल०टी०सी० पर पूरे भारत का भ्रमण कर लिया होगा?’’
फाइले निपट चुकी थी। फुरसत के क्षण थे। मैनें उनकी जिज्ञासा शांत करने हेतु उनसे कहा--
’'मुझे बत्तीस साल के सेवा काल में कभी बोरियत का अहसास नही हुआ इसलिए मैनें एल०टी०सी० का उपयोग ही नहीं किया।'’
वे बुरी तरह चौंके।
जारी है ...................
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