ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र (भाग-10)
दिनांक : 27.09.2026

वह धीमे-धीमे कदमो से मेरे चेबर से बाहर जा रहे थे। आज चेंबर का गेट खोलने का उनका अंदाज निराला था
हमारी जिम्मेदारी हैं कि हम युवामन को बोरियत के रोग से निजात दिलवाने का प्रयास करे।
युवा ओशेा दिल्ली प्रवास पर थे। उनके मित्र बडे शिक्षाशास्त्री थे। बाद में वे कुलपति भी हो गए थे। वह कई मुददो पर ओशो से संवाद करने आए थे। औपचारिक बातो के बाद कुलपति ने ओशो से मुखातिब होकर अपने मन की पीडा व्यक्त की। उन्होने कहा--
''हम युवाओ को शिक्षित तो कर रहे है लेकिन माकूल नतीजे सामने नही आ रहे है।'’
‘’ आप माकूल नतीजे किसे मानते है?’’ ओशो ने जानना चाहा।
‘’शिक्षा के बाद भी देश में बेइमानी, मक्कारी, हरामखोरी और चापलूसी बढती जा रही है। इस पर कैसे अंकुश लगे। आप ही कोई उपाय सुझाए।'’
‘’आप देश की बात तो एक बार छोड दे। अपने बच्चो की बात करे। क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चे ईमानदार, सत्यवादी और निष्ठावान बने?’’ ओशो ने रुखे और सपाट लहजे मे पूछा। उन्हे ऐसे प्रश्न की उम्मीद नही थी। वह हिचकिचाए। मरीयल आवाज में इतना ही कहा पाए--
‘’हॅा। मैं, ऐसा चाहता हॅू।'’ कुलपति महोदय के शब्दो में कंपन साफ झलक रहा था।
‘’आपकी आवाज क्यो कांप रही हैं? क्या आप नही चाहते कि देश के लोग तो ईमानदार, निष्ठावान और सत्यवादी बन जाए तथा आपकी संतान इन सदगुणो से वंचित रहे?’’ ओशो ने अपने चिरपरिचत अंदाज में पूछा।
उनके पास शब्दो का अकाल पड गया।
उनकी दयनीय स्थिति का पूरा लुत्फ उठाया ओशो ने। लेकिन मात्र, सत्य कहना ही ओशो के जीवन का उद्देश्य नही था, बल्कि सामने वाले को सत्य कबूल करवाना भी उनके अभियान का अभिन्न अंग था। इसी अभियान के बेनर तले ओशो ने कुलपति महोदय से नजरे मिलाकर चोट की --
‘’कहना आसान है। उसे अमली जामा पहनाना मुश्किल हैं। मोहल्ले के किसी व्यक्ति का पुत्र संन्यासी हो जाए तो आप उसके स्वागत में बैंड बाजे बजवा देगें। उसे एक अदितीय घटना के रुप में प्रचारित करेगें। लेकिन आपका पुत्र संन्यासी होने का प्रस्ताव आपके पास लेकर आए तो आपकी रुह कॅाप जाएगी।'’
वह दबे स्वर में हथियार डालते हुए बोले--’’ आपने तो मेरी नस ही पकड ली।'’
‘’मैं तो नस ही पकडता हूँ। मैं आपसे सीधा प्रश्न पूछता हॅू। क्या आप अपनी संतान को दगा, फरेब, खुशामद, बेइमानी से छुटकारा दिलवाना चाहते है, या नहीं?’’ ओशो ने सीधा सवाल किया।
‘’हॅा। छुटकारा दिलवाना चाहता हूँ।'’ उनके शब्दो में आत्मविश्वास का नामोनिशान नही था। शायद सोच रहे हो कि उन्होने सवाल करके जिंदगी की सबसे बडी गलती कर दी है। अब इसे संभालना तो होगा।
‘’नही। आप पूरी हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ ऐसा नही कह पा रहे हैं। पूरे देश के युवाओ की बात छोडिए। अपने घर तक ही सीमित रहे। पहले अपनी ही संतान को इनसे मुक्त करने के प्रयास करने होगे। आप पूरी दृढता से तो कहिए। क्या आप ऐसा चाहते है?’’ यह प्रश्न पूछकर ओशो ने उन्हे धर्मसंकट में डाल दिया।
कुलपति महोदय बूझे स्वरो में बोले-- ’’मैं पूरी हिम्मत और आत्मविश्वास से तो ऐसा नहीं कह पाउॅगा। मेरी हार्दिक ईच्छा हैं कि जिस पद तक मैं पहुँचा हॅू। मेरे बच्चे उससे ऊपर नही तो कम से कम इस पद पर तो पहॅूचे। मैं यह भी जानता हूँ कि यदि मेरा पुत्र ईमानदार, सत्यनिष्ठ और नैतिक हो जाए तो इस पद तक पहॅुचना मुमकिन नहीं होगा।'’
जारी है ...................
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