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भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 25

  • 18 hours ago
  • 3 min read

दिनांक : 26.04.2026

जिस्म में होने वाली पाचन क्रिया स्वचालित हैं। भोजन को पचाने के लिए, हमें कोई प्रयास नहीं करना पडता है। यह कितनी बडी नेमत है। कई लोग सवेरे 33 बार अपनी अंगुलियो पर इस आयत को पढते है और अल्लाह ने जो कुछ भी दिया हैं उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करते है। जो हैं, उसी में अपनी संतुष्टि प्रकट करते है और जो नही है, उसके प्रति शिकायत नहीं करते हैं। इस आयत से अहोभाव की उत्पत्ति होती है और भावनाओं को शुद्व करने में मदद मिलती हैं। यह आयत घोषणा करती है कि अल्लाह ने इंसान को बोलना सिखाया। सूरज और चॉद निर्धारित दायरे में चलने का निर्देश दिया।

सितारे और पेड भी अल्लाह के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए झुक रहे है अर्थात वे सिजदा कर रहे हैं। कुरआन भी बार-बार अपील करता है कि इन नेमतो के लिए हम जितनी बार अल्लाह का शुक्र करे, उतना ही कम हैं।

ईसाईयत में भी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए प्रार्थना, धन्यवाद और दूसरों की सेवा करने के प्रावधान हैं। ईसाई भी नियमित रुप से प्रार्थना करते हैं और अपने परमेश्वर के उपकारो के लिए धन्यवाद ज्ञापित करते है। वे आनंद के लिए अपने परमेश्वर से आर्शीवाद भी मॉगते हैं। ईसाईयो को सिखाया जाता हैं कि वे हर बात के लिए परमेश्वर को धन्यवाद दे। चाहे वह बात या कार्य अच्छा हो या बुरा। ईसाई भोजन से पहले या बाद में परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और अपना अहोभाव भी प्रकट करते है। वे परमेश्वर की प्रशंसा करते है। उसके महान कार्यो के लिए आभार प्रकट करते है। उनके आभार प्रकट करने के तरीको में स्तुति, संगीत और प्रार्थना का प्रचलन रहा है। कई ईसाई तो ऐसे भी होते हैं जो कृतज्ञता का अभ्यास करने के लिए दैनिक या साप्ताहिक रुप से एक कृतज्ञता पत्रिका रखते है जिसमें वे उन चीजो को लिखते हैं, जिसके प्रति वे आभारी है। कई ईसाईयों का मानना हैं कि प्रभु को धन्यवाद देने का सबसे आसान तरीका प्रभु की स्तुति करना हैं। वे फुरसत के क्षणो में अपने परमेश्वर की स्तुति गायन के माध्यम से भी करते हैं। उनका मानना है कि गीत के माध्यम से की गई स्तुति, सुनने वाले व्यक्ति पर भी अपना असर डालती है। फिलिपियो में तो यह थी कहा गया हैं कि ‘‘किसी बात की चितां मत करो, परंतु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ उपस्थित रहो।‘‘

दि सिक्रेट के अनुसार संपूर्ण श्रृद्दा से परमात्मा के प्रति प्रकट की गई, कृतज्ञता, ब्रहमाण्ड तक जाती है। कृतज्ञता का प्रकटीकरण, यांत्रिक नहीं होना चाहिए। कृतज्ञता, एक पावन कर्तव्य की प्रेमपूर्ण अभिव्यक्ति होनी चाहिए। लेखिका, रंडा बर्न, द सीक्रेट बुक में कहती हैं कि सच्चे दिल से आभार प्रकट करना आवश्यक हैं। सच्चे दिल से निकले कृतज्ञता के भावो का चमत्कारिक प्रभाव होता हैं। यह चमत्कार जीवन को पूर्णता प्रदान करते हैं। यदि कोई व्यक्ति इसी समय ठान ले कि उन्हे अपने जीवन को रुपांनतरित करना हैं। तो उसे ईमानदारी के साथ अभ्यास करना चाहिए। इस दिशा में पहला कदम यह हो सकता हैं कि जो सपने बरसो से सजो रखे है उन्हे साकार करने की प्रबल प्यास पैदा करे। इस अभ्यास का शुभारंभ सिर्फ और सिर्फ कृतज्ञता से ही किया जा सकता हैं। सबसे पहले तो हमें अपने मन की गहराइयों में जाकर विचार करना होागा कि वह कौनसा स्वपन है, जिसे हम साकार होते हुए देखना चाहते हैं। जिसके प्रति धन्यवाद का भाव उठता हैं। उसे बार-बार स्मरण करने से भावनाएं प्रबलता की ओर गमन करती है। जो शक्ति, जीवन के जिस अभाव पर क्रेदित थी, वह रुपान्तरित होने लगती है। जिन चीजो का जीवन में अस्तित्व हैं, वे हमारी प्रसन्नता का ग्राफ बढाती हुई प्रतीत होती हैं। ऐसे भाव जागृत होने से जगत के प्रति धन्यवाद का भाव उत्पन्न होता हैं। हमारे आधिपत्य की प्रत्येक वस्तु हमे अच्छी लगने लग जाती है।

आगे जारी है......... 

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1 Comment


Bhag Chand Jat
Bhag Chand Jat
5 hours ago

यह लेख सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए है।

कृतज्ञता को जिस गहराई और सच्चाई से समझाया गया है, वह दिल और सोच दोनों को छू जाता है।

हर पंक्ति यह एहसास कराती है कि असली सुख बाहर नहीं, बल्कि धन्यवाद के भाव में छुपा है।

ऐसे विचार सच में इंसान के नजरिए को बदलकर जीवन को नई दिशा देने की ताकत रखते हैं।

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