ओशेा ने बताए- आनंदित जीवन के सूत्र (भाग-7)
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दिनांक : 23.08.2026

बालमन को हॅसने-खेलने का अवसर दिया जाए तो उनके जीवन में कुंठा नामक रोग की एंटरी नहीं होगी। बच्चेा की हॅसी कृत्रिम नही होती बल्कि नैसर्गिक होती है। उन्हे हॅसने पर हतोत्साहित करने से रेचन क्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पडेगा। ओशो तो उदास लोगो की जमात को रुग्ण लोगो का समूह मानते थे। उन्होने कई उदास साधुओ की जीवन शैली की उनके सामने ही निंदा करते हुए, उन्हे मनोरोग विशेषज्ञो से उपचार कराने की सलाह देने में कोई हिचक नही दिखाई।
विश्व के बडे मनोवैज्ञानिक भी स्वीकार कर चुके हैं कि प्रफुल्लता स्वस्थ मनुष्य का लक्ष्ण हैं। मेरा व्यक्तिगत अनुभव हैं कि जैसे-जैसे हम प्रफुल्लता को दिनचर्या का अंग बनाते जाएगें, वैसे-वैसे हास्य की किरणे जीवन को आनंदित बनाने हेतु फैलती जाएगी। कुछ दिनो की प्रफुल्लता से ही साफ होने लगेगा कि जीवन में हॅसने की कितनी बाते है। हॅसने के क्षैत्र को विस्तार देने में प्रफुल्लता का अहम योगदान हैं।
प्रफुल्लता के भाव से चारो तरफ नजर दैाडाए तो महसूस होगा कि स्वंय के जीवन में प्रतिदिन हास्य को उत्पन्न करने वाली घटनाओ की भरमार हैं। दूसरो के जीवन को गैार से देखने की कला आ जाए तो उसमें भी हॅास्य के सैकडो किस्से मिल जाएगें।
ओशो एक घटना सुनाते है। ओशो के एक सन्यासी डॉक्टर हमीद इरानी थे। ओशेा की एक सन्यासिनी दिव्या से उन्हे प्रेम हो गया। दोनो को कुछ समय बाद उब होनें लगी। दिव्या को चिकित्सक ने सलाह दी कि वह कुछ दिनो के लिए स्थान और वातावरण को बदल ले। दिव्या ने कहा कि वह वातावरण तो बरसो से परिवर्तित कर रही हैं। उसने स्पष्ट किया कि पिछले कुल चार वर्षेा में उसनें दो पति, चार नैाकर, तीन सचिव और पाँच प्रेमी बदले हैं। अब और क्या बदले? हमीद भी थके-थके रहने लगे और दिव्या के हालात भी हमीद के समान ही थे।
उन दोनो ने ओशो को पत्र में लिखा कि वे बुरी तरह उब चुके है। उन्हे अलग-अलग कर दिया जाए। जब ओशो ने महसूस किया कि दोनो की थकान का लेवल सौ डिग्री तक पहुँच चुका है। तब ओशो ने दोनो को अलग-अलग करवा दिया।
थोडा वक्त गुजरा और दोनो के मन में प्रेम के मेघ गरजना करने लगे। जब प्रेम के मेघो की गरजना घनी होने लगी तो उन्होने फिर ओशो को पत्र लिखकर पुनः साथ-साथ रहने की ईच्छा प्रकट की। लगभग दो माह तक ओशो उनकी ईच्छा को सौ डिग्री तक पहुँचने की प्रतीक्षा करते रहे। जब उनकी ईच्छा का पारा सौ डिग्री पार करने लगा। उनमें दीवानगी का आलम नजर आने लगा तो ओशो ने दोनो को साथ-साथ कर दिया। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। दूसरे ही दिन हमीद ने ओशो को एक पत्र में लिखा कि वे सूफियों की एक कहावत बचपन से सुन रहे हैं। सुफियो ने कहा हैं कि आदमी ही एक ऐसा गधा है जो बार-बार एक ही खडडे में गिरता रहता है। गधा भी अक्ल से इतना पैदल नही होता कि वह दुबारा उसी खडडे में गिरने की बेवकूफी करें। गधे चाहे थककर चूर हो जाए फिर भी उसी गडढे में तो गिरना पसंद नहीं करेगें। उसके मन के किसी कोने में गिरने की आकांक्षा भी पैदा हो गई हो तो भी वह दूसरे गडढे में गिरना पसंद करेगा। हमीद ने यह भी लिखा कि यह सूफी कहावत अब समझ में आ गई हैं।
आखिर मन उब के रोग से क्यो ग्रसित होता है? इसका उत्तर जानने के लिए मन की प्रवृति को गहराई से समझना होगा। ओशो ने सैकडो बार चेतावनियॅा दी हैं कि मन के जाल को समझो। इससे संघर्ष करने से नुकसान के अलावा और कुछ भी पल्ले पडनें वाला नही है।
मेरा न्यायिक सेवा का तैतीस साल का सफर रहा। इस सफर को बडे आनंद के साथ जीया। मुझे कई साथी न्यायिक अधिकारी कहते रहते थे कि रोजाना एक जैसा काम करते-करते, बोर हो गए। अब तो काम में मन नही लगता है। रोजाना सुबह दस बजे सफेद डेस पहनकर आओ। आते ही स्टोनो को डिक्टेशन के माध्यम से फैसला लिखाओ। साढे दस बजे काला कोट पहनकर अदालत में बैठकर गवाहो से उनका नाम पता पूछो। उनके शपथ पर कहे गए असत्य कथनो को लिखो।
मेरे समक्ष एक न्यायिक अधिकारी ने अपनी बोरियत की समस्या को इस तरह प्रकट किया-
‘’गवाह की भाव भंगिमा से ही मुझे आभास हो जाता हैं कि गवाह झूठ बोल रहा हैं। मैं कसमसाकर रह जाता हॅू। कर कुछ नहीं पाता। सिर्फ उसके बयान टाईपिस्ट से लिखवाता रहता हॅू।'’
मैने उनकी पीडा को गंभीरता से सुना। मैने कहा-
‘’ गवाह के मुहँ से सत्यता उगलवाना अभियुक्त के अधिवक्ता का कर्तव्य है। कानून ने उसको गवाह से जिरह करने का महत्वपूर्ण अधिकार दिया हैं। वह गवाह से सत्यता प्रकट करवाने के लिए उससे किसी भी तरह के सवाल कर सकता है।'’ मैनें उन्हे कानून के सुसंगत बिंदू याद दिलवाए।
जारी है ...................
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