What Are Emotions Called? (Part - 19) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 19)
- ayubkhantonk
- 22 hours ago
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दिनांक : 08.02.2026

अेाशो ने मानव के प्रसन्न अैार आनंदित होनें के कई सूत्रो की इजाद की हैं । वे चाहते है कि लोगो के जीवन में प्रसन्नता का बसंत आए। प्रेम के मेघ बरसे अैार दुखी मनुष्यता मे आनंद के बीज अंकुरित हो सके। जब आनंद के बीज अंकुरित हो अैार उसकी महक आने लगे तब अेाशो आगाह करते हैं कि उस समय आनंद के साथ तादात्मय स्थपित मत कर लेना । ऐसा मत सोचना कि मैं आनंद हो गया। जागरुक रहकर साक्षी रहते हुए देखना कि आनंद तो चाारो तरफ से घेरे हुए हैं लेकिन मैं अलग हूॅ। आनंद तो एक दृश्य है, मै उस दृश्य को देखने वाला दृष्टा हूॅ। अेाशो के अनुसार दुख से तो स्वयं को अलग करना आसान है परंतु सुख से अलग करना जरा कठिन हैं। इसलिए अेाशो ने साधको को सलाह दी कि इस प्रक्रिया को आनंद से ही आरंभ करना उचित होगा। इसे ऐसे समझना होगा कि जब ध्यान के दौरान आनंद का घेरा बनने लगे तब सोचना की मैं तो मात्र दृष्टा हूॅ। कल पीडा ने घेरा था अैार आज आनंद ने, हो सकता है कि कल मै पीडा के घेरे मैं आ जाउॅ? लेकिन मैं तो दृष्टा हूॅ। इसी दृष्टा भाव में स्थिर होना ही साक्षी होना है। इस प्रक्रिया से भावो का शुद्दिकरण होगा। हमारी भावनाये शुद्द होगी।
अेाशो एक सदाबहार खुशमिजाज साधु की कथा से प्रसन्नता के भाव को अैार अधिक स्पष्ट करते है। मेरी दृष्टि में अेाशो इस युग के महान कथाकार हैं। इस कथा को अेाशो के शब्दो में लिख्नना ज्यादा ठीक होगा। बोध कथा सुनिये अेाशो के हुबहु शब्दो में-----
‘’ एक साधु हुआ। वह जीवन भर इतना प्रसन्न रहा कि लोग हैरान थे। लोगो ने उसे कभी उदास अैार पीडित नहीं देखा। उसके मरने का वक्त आया तो उसने कहा कि अब मैं तीन दिन बाद मर जाउॅगा। यह मैं, इसलिए बता रहॅा हूॅ कि स्मरण रहे कि जो आदमी जीवन भर सबको हंसता रहा। उसकी चिता पर कोई नहीं रोए। जब मैं, मर जाॅउ तो मेरे झोपडे पर मातम नही हों। यहॅा सदैव आनंद अैार उत्सव रहा था। इसलिए मेरी मृत्यु को भी उत्सव मनाना । लोग तो दुखी हुए। वह अदभूत आदमी था। उससे प्रेम करने वाले लोगो की संख्यॅा बहुत थी। प्रेमी लोग साधु के झोपडे पर एकत्रित होना शुरु हो गए। वह मरते वक्त तक लोगो को हॅसा रहा था। वह प्रेम की अदभूत बातें कर रहा था। सुबह मरने से पहले उसने गीत गाया। गीत गाने के बाद उसने कहा कि '' याद रखना, मेरे कपडे मत उतारना । मेरी चिता पर मुझे, कपडो सहित लेटा देना। मुझे चिता पर लेटाने से पहले मुझे स्नान मत करवाना। फिर वह मर गया। उसे अंतिम स्नान नहीं करवाया गया। उसे कपडो सहित, चिता पर लेटा दिया गया। उसके मित्र अैार शिष्य उदास अैार गमगीन थे। लेकिन सभी लोग यह देखकर हैरान हुए कि उसने, अपने कपडो में फुलजडिया अैार फटाखे छिपा रखे थे। जैसे ही उसकी चिता को अग्नि दी गई तो पटाखे अैार फुलजडिया छूटने शुरु हो गए। उसकी चिता भी उत्सव बन गई। लोग खिलखिलाकर हॅसने लगे। लोगो ने कहा कि जिसने जिंदगी भर लोगो को हॅसाया, वह मरनें के बाद भी लोगो को हॅसा गया।'’
आगे जारी है.........
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Nice
यह लेख यह सिखाता है कि सुख हो या दुख, दोनों को पकड़ना नहीं है—सिर्फ देखना है।
जब आनंद आता है तब भी यदि हम उससे अलग रह पाते हैं, तभी असली स्वतंत्रता जन्म लेती है।
कहानी यह समझा देती है कि जिसने जीवन को पूरी जागरूकता से जिया, उसकी मृत्यु भी बोझ नहीं बनती।
यह लेख मन को नहीं, चेतना को छूता है।
धन्यवाद।
बेहतरीन प्रस्तुति..