What Are Emotions Called? (Part - 18) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 18)
- ayubkhantonk
- Jan 25
- 3 min read
Updated: 6 days ago
दिनांक : 25.01.2026

मेरे मस्तिष्क में बार-बार प्रश्न उठता हैं कि जब अेाशो जैसी महान चेतना यह उदघोष करती है कि आनंदमग्नता प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव है। तब इस उदघोषणा पर मंथन करना आवश्यक हो जाता हैं। मंथन के अनुक्रम में, इसे हम ऐसे भी समझ सकते कि नवजात शिशु के ह्रदय में परमात्मा प्रसन्नता अैार आनंद के केंद्र स्थापित करके भेजता है। बालक की आयु में जैसे-जैसे वृद्दि होनें लगती है वैसे-वैसे, प्रसन्नता अैार आनंद के केंद्र सिकुडते चले जाते है। एक स्थिति ऐसी आती है जब ह्रदय में फिट किए गए आनंद अैार प्रसन्नता के केद्र पर संताप, दुख, पीडा अैार चितां के तत्व बहुतायत में प्रविष्ट होकर परमात्मा द्रारा प्रदत इस केंद्र पर आच्छादित हो जाते है। परिणामस्वरुप इस केंद्र का क्षय होने लगता हैं। हमारे परिवेश की वजह से यह अतिमहत्वपूर्ण केद्र धीरे-धीरे अेाझल हो जाता हैं।
अधिकांश व्यक्तियों की इस समस्या पर अेाशो ने विश्व के नामी गिरामी मनाेवैज्ञानिको के शोघ ग्रंथो को पढने अैार स्वयं के अनुभव से यह निष्कर्ष निकाला कि मानव के मन में दुख, पीडा अैार संताप के भावो की जडे इतनी गहरी जम चुकी है कि मानव इन भावो का अभ्यस्त होकर, इनकी जडो में खाद-पानी डालकर, इन्हे पोषित कर रहा है। जब कभी सुख या आनंद की कोई झलक नजर आती है तो वह प्रसन्न होने के बजाय बेचैन हो जाता हैं। उसे यह झलक वास्तविक प्रतीत नहीं होती क्योेंकि प्रसन्नता अैार आनंद का अनुभव अैार बोध समाप्त हो चुका होता है। मीडिया में भी दुख भरी खबरे दिखाने अैार छापने की होड लगी हुइ हैं।
हम भी जब आपस में मिलते है तो बीमारी की बाते बढा चढाकर बताने के अभ्यस्त हो चुके हैं। समाचार पत्र भी एसे समाचारो को कवर करने से परहेज करते जो मन में आनंद का संचार करते हो। दूसरी अेार हत्या, बलात्कार, चोरी, लूट की खबरे मुख पृष्ठो की शोभा बढाती हैं। किसी की बगिया में सुदंर गुलाब खिला हो, उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाएगा। हम भी हत्या, बलात्कार अैार लूट खबरे रस ले लेकर पढते है। यह क्या हो गया है? विश्व में कही युद्द हो रहा हो तो ऐसी खबरे लाइव दिखाई जाती है। जनमानस पर पडने वाले प्रभाव के बारे में कोई चितिंत नहीं होता हैं।
कहना यह चाह रहा हॅेू कि जब मित्र आपस में मिले तो प्रसन्नता की बाते करे। परिवारजन, जब डीनर की टेबिल पर एक साथ बैठे तो खुशी का माहोल निर्मित करने का प्रयास करे। एक दूसरे को हास्य कथाए सुनाए। फूलो की सुदंरता अैार खुशबु पर चर्चा करे। गुलाब के साथ सलंग्न काॅटो पर चर्चा करना अैाचित्यहीन हैं। कॅाटो पर की गइ चर्चा सकारात्मक प्रभाव नही छोडेगी।
हम खोज तो आनंद की करना चाहते है। लेकिन ऐसे कृत्यो में सलंग्न है जो चिंता, बेचेनी अेार संताप को आमंत्रित करते हैं। जिन भावो को हम आमंत्रित करेगें वे भाव ही जीवन में प्रविष्ठ होंगे। हम जानते हैं कि यह मार्ग, बेचेनी अैार संताप की अेार जा रहा है फिर भी उसी मार्ग पर निरतंर गमन करना मानसिक दिवालियेपन का प्रतीक हैं। प्रसन्नता अैार आनंद को जीवन में प्रविष्ट होने के लिए सवर्प्रथम तो उन दरवाजो को बंद करना होगा जहॅा से बैचेनी, दुख संताप अैार अवसाद का आगमन होता हैं। इसलिए अेाशो ने तो यहां तक कह दिया था कि आदमी दुखवादी है। वह दुखो का जानबूझकर संग्रह करता हैं। यदि आदमी दुखो का संग्रहकर्ता नहीं होता तो पृथ्वी पर स्वर्ग अवतरित हो सकता था। आदमी की दुखवादी प्रवृति के कारण ही जीवन नारकीय हुआ है। अगर लोग प्रसन्नचित होते तो वे क्यो दूसरो को दुख देते? सरल सा सिदांत हैं कि जिस व्यक्ति के पास जो होता है, वही, वह दूसरो को दे सकता है। ओर तो और, अपने ही लोग ज्यादा दुख देते हैं। लोगो के पास संपदा ही दुख की हैं तो वे दुख ही देंगें। आनंद अैार प्रसन्नता उनके भंडारगृह में है नही तो फिर वे कैसे
दूसरो को आनंद अैार प्रसन्नता बॅाट सकते हैं। मेरे विचार में कोई व्यक्ति प्रसन्न रहने का संकल्प कर ले तो उसके जीवन में प्रसन्नता का पदार्पण हो सकता हैं। जब कोई व्यक्ति प्रसन्न रहता है तो आसपास प्रसन्नता का घेरा विकसित होनें लगता हैं। वातावरण में भी परिवर्तन महसूस होनें लगता हैं। फिजा में तबदीली आने लगती है। एसे प्रसन्न मन से भाव शुद्दि में सहयोग मिलता हैं।
आगे जारी है.........
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Nice
यह लेख मनुष्य के अंतर्मन की उस त्रासदी को उजागर करता है जहाँ आनंद स्वभाव होते हुए भी दुख संस्कार बन जाता है। ओशो के दर्शन के आलोक में यह चिंतन आत्मबोध की ओर ले जाने वाला है।