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What Are Emotions Called? (Part - 21) (हिंदी अनुवाद- भावनाऍ किसे कहते है? भाग - 21)

  • 9 hours ago
  • 3 min read

दिनांक : 08.03.2026

एक घंटे तक पूरी ताकत से हॅसने से अेाशो के सक्रिय ध्यान का दूसरा चरण, केथार्सिस पूर्ण हो जाता हैं। अेाशो ने पाॅच चरणो के इस ध्यान प्रयोग में केथर्सिस पर काफी बल दिया है। हमारे मन में दमित भावनाऍ एकत्रित होकर अवचेतन में चली जाती है। जिससे मन के भीतर एक कौलाहल, चोबीस घंटे चलता रहता हैं। यह कोलाहल नींद मे भी चलता रहता है जिसे हम ख्वाब के नाम से जानते है। एक घंटे के हास्य से यह दमित भावनाऍ अवचेतन से बाहर निकलने लगती है। मन अैार मस्तिष्क हल्के होते जाते हैं। अेाशेा ने केथार्सिस की आवश्यकता बताते हुए कहा कि जो बाते हमें पंसद नही होती है या जो हमारे काम में व्यवधान उत्पन्न करती हैं, उन्हे मस्तिष्क से बाहर फेंकने से हानिकारक घटनाओं के संग्रह से मुक्ति मिलती हैं। केथार्सिस को हमारे यहाॅ रेचन भी कहा जाता हैं। इस विधि से हम अपने भीतर के क्रेाध दुख, डर आदि को बाहर निकालने का प्रयास करते है। इसमे किसी को रोना आए तो वह रो सकता है। किसी की ईच्छा चिल्लाने की हो तो वह पूरी शक्ति के साथ चिल्ला सकता हैं। जिसको जो स्वाभाविक लगे ा वह वैसा करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। इस क्रिया के दैारान आंतरिक छोर को छूने तथा दमन काे बाहर फेकने का प्रयास किया जाता है। कई बार हम नहीं जानते या महसूस नहीं करते लेकिन दमन इतना गहरा होता हैं कि हमें उसके बारें में जानकारी भी नहीं होती है। अेाशो के संक्रिय ध्यान के इस दूसरे चरण को हमने हास्य तक ही सीमित रखा। माताजी के साथ रोजाना मोबाइल स्पीकर पर पूरी ताकत के साथ हॅसना, दैनिक दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया है। चार साल के इस पीरियड में उच्च् रक्तचाप सामन्य हुआ। मन शांत हुआ। दमित भावनाये निकली तो विचारो के चलने की गति पर भी अंकुश लगा है। मै आनंदित होउगा यदि आप भी हमारे रेचन के इस ढंग को आरंभ करे अैार आजीवन निरंतरता बनाए रखे।

प्रसन्नता अैार आनंदमग्नता, भाव शुद्दि के लिए क्यों आवश्यक है, इसकी चर्चा में यह निष्कर्ष निकलकर आया कि जब मन प्रसन्न होगा तो प्रत्येक चीज को देखने का दृष्टिकोण बदल जाता हैं। सब कुछ अच्छा अैार पवित्र लगने लगता हैं।


अेाशो द्रारा कही गई, एक आनंदित साधु के अंतिम समय की बोध कथाा को हमने महाबलेश्वर के अमृत प्रवचन से उदर्त करके लिखा है। इसके विपरित बचपन में बुजुर्गो से सुनी हुई कथा का उल्लेख करना भी प्रसांगिक होगा। इस कथा से हम यह समझााना चाहते हैं कि मानव के मस्तिष्क में ऐसी भी खुराफात पैदा हो जाती है जो संपूर्ण समाज के लिए अहितकर होती है। कथा पर गौर करे--

    

इसलिए किसान संपंन था। कोई कमी नही थी फिर भी वह उॅची ब्याज दर पर गाॅव के लोगो को धन भी उधार दिया करता था। कभी कोई जरुरतमंद व्यक्ति उधार धन लेने आता तो पत्नी से कहलवा देता कि रामदेव अभी घर पर नहीं है, कल आना। जरुरतमंद व्यक्ति दूसरे दिन आता तो उसको कह देता कि कल लिखापढी करके पैसे दे दूॅगा। जरुरतमंद फिर अगले दिन आता तो उस दिन लिखापढी तो कर लेता परंतु बहाना बना देता कि अमुक शख्स को पैसा उधार दिया हुआ है। वह आज रात को लाएगा इसलिए तुम कल ले जाना। अगले दिन जरुरतमंद नियत समय पर पैसे लेने उसके घर आता तो वह जानबूझकर खेतो में चला जाता । फिर अगले दिन वह जरुरतमंद को पैसे देता।


आगे जारी है......... 



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